पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन भगवान महावीर जन्म कल्याणक का हुआ भावपूर्ण श्रवण
परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कल्पसूत्र के माध्यम से सुनाया भगवान महावीर के जन्म का प्रसंग, धन के सदुपयोग का दिया संदेश

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में पर्यूषण पर्व श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है। पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कल्पसूत्र के माध्यम से भगवान महावीर के जन्म कल्याणक का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर के जन्म कल्याणक का श्रवण स्वयं जन्म महोत्सव के समान आनंददायी और पुण्यकारी है। महाराज साहेब ने बताया कि भगवान महावीर की माता त्रिशला ने रात्रि में 14 मंगलकारी स्वप्न देखे थे। प्रात: राजा सिद्धार्थ ने स्वप्न पाठकों को बुलाकर इन स्वप्नों का फल जानना चाहा। स्वप्न पाठकों ने शास्त्रानुसार विचार कर बताया कि महारानी द्वारा देखे गए सभी स्वप्न अत्यंत मंगलकारी हैं। उनके गर्भ में आने वाला पुत्र अत्यंत पुण्यशाली होगा तथा वह चक्रवर्ती अथवा तीर्थंकर पद को प्राप्त करेगा। स्वप्नों का फल बताते हुए कहा गया कि महारानी का पुत्र दान, शील, तप और मोक्ष—इन चार प्रकार के धर्मों का पालन करने वाला, धर्म की रक्षा करने वाला तथा धर्म का पालन करने और कराने वाला होगा। वह चरित्र अंगीकार कर तीर्थंकर पद रूपी लक्ष्मी का वरण करेगा तथा त्रैलोक्य वंदनीय बनेगा। यह सुनकर राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला अत्यंत प्रसन्न हुए। प्रवचन में भगवान महावीर के गर्भकाल का प्रसंग सुनाते हुए महाराज साहेब ने बताया कि भगवान महावीर ने विचार किया कि गर्भ में उनके हिलने-डुलने से माता त्रिशला को कष्ट होता होगा। माता को कष्ट न हो, इसलिए उन्होंने हिलना बंद कर दिया। जब माता त्रिशला को गर्भ में कोई हलचल महसूस नहीं हुई तो वे चिंतित और दुखी हो गईं। माता-पिता एवं नगरवासियों को दुखी देखकर भगवान महावीर ने पुन: अपने शरीर का एक अंग हिलाया, जिससे माता को गर्भ सुरक्षित होने का अनुभव हुआ और वे प्रसन्न हो गईं। इसी प्रसंग में भगवान महावीर द्वारा माता-पिता के प्रति करुणा एवं संवेदनशीलता का परिचय देते हुए माता-पिता के जीवित रहते दीक्षा अंगीकार नहीं करने का संकल्प लेने की बात भी बताई गई। महाराज साहेब ने कहा कि भगवान महावीर की आत्मा के गर्भ में आने के बाद राज्य में धन-संपत्ति एवं वैभव की वृद्धि होने लगी। इसी कारण राजा सिद्धार्थ ने पुत्र का नाम वर्धमान रखने का विचार किया। भगवान के जन्म का समय निकट आने पर राजभवन में अष्टमंगल, शुभलेप एवं जिनेश्वर परमात्मा की पूजा-अर्चना सहित विभिन्न मंगल कार्य प्रारंभ हो गए। प्रवचन के दौरान महाराज साहेब ने धन के उपयोग को चार प्रकार के जलस्रोतों से जोड़ते हुए समाज के लिए प्रेरणादायी संदेश दिया।