मानव जीवन और जिनशासन दोनों एक साथ मिलना अत्यंत दुर्लभ है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आगे प्यार पीछे खार, यही संसार का नियम है। हम स्वयं दूसरों के लिए कांटे बोने का काम करते है। लेकिन जब वही कांटा हमे चुभ जाता है तो हम ही आह भी करते है। प्यारा सा बचपन हमने खेलकूद में खो दिया। उसके बाद जब युवावस्था आया उसे भी मदमस्त होकर संसार के संताप में बर्बाद कर लिया। हे चेतन अब सोच बुढ़ापे में कौन तेरे साथ है। अंत में तेरे साथ क्या जाएगा। कई जन्मों के पुण्य के कारण ये मानव जन्म मिला था। उसे भी पाप कार्यों में हमने लिप्त रहकर व्यर्थ कर दिया। जीवन में जब तक सांस चलते रहा तब तक मेरा मेरा करते रहे। जबकि मरने के बाद कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है सबकुछ यहीं छोड़कर जाना पड़ेगा। मानव जीवन और जिनशासन दोनों एक साथ मिलना अत्यंत दुर्लभ है। परमात्मा के शासन का अर्थ धर्म की सामग्री या धर्म करने के साधन से है। जब हमने ये सुअवसर प्राप्त किया है तो इसका पूर्णत: सदुउपयोग करना है। आज हमारे पास परमात्मा तो प्रत्यक्ष नहीं है लेकिन उन्होंने जो कहा वो जिनवाणी के रूप में हमारे पास है। अब हमें परमात्मा के द्वारा बताई गई जीवन शैली के आधार पर जीवन व्यतीत करते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर बढऩा है। उत्तराध्ययन सूत्र का दूसरा अध्याय है परिषह प्रविभक्ति। हमें प्रयास करना है कि किसी भी प्रकार की कोई भी घटना जो जीवन में घटे उसे स्वीकार करना है। जीवन में सुख की चाह करने वाला जीव सहनशीलता को बढ़ाने का प्रयास करता है। जीवन में सुविधाएं तो बढ़ रही है लेकिन इसके कारण सहनशीलता कम होती जा रही है। परिणाम स्वरूप सुख कम होते जा रहा है। सुविधाभोगी जीव सुखी नहीं हो सकता। जीवन में सुखी होने का आसान सा मंत्र है जो प्राप्त है वही पर्याप्त है। जीवन में आवश्यकता पडऩे पर कुछ कहना भी पड़ता है और कभी कभी कुछ सहना भी पड़ता है। एक दूसरे की गलती को समझने, स्वीकारने और सुधारने का प्रयास ही अच्छी जीवन शैली है। ज्ञानी कहते है अनुकूल परिस्थिति में पद, पैसा, प्रतिष्ठा और परिवार साथ होते है जबकि प्रतिकूल परिस्थिति में कोई साथ नहीं देता।
