संपत्ति के प्रति स्वार्थ और स्नेह न रखने वाला ही संसार को छोड़कर सिद्ध अवस्था तक पहुंच सकता है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि परमात्मा कहते है अब ऐसा अवसर मिला है कि जीव स्वयं को पहचाने। आत्म बोध को प्राप्त करे ताकि आत्मा का विकास हो सके। ज्ञानी कहते है वास्तव में ज्ञान वही सार्थक है जो दुख को दूर करे। ज्ञान से जीवन का विकास होना चाहिए। जिस प्रकार एक व्यापारी को कितना विक्रय उसने किया उससे कोई मतलब नहीं होता बल्कि लाभ कितना हुआ उससे मतलब होता है। उसी प्रकार हमें ज्ञान कितना है वह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उससे हमारा दुख कितना कम हो रहा है ये महत्वपूर्ण है। जब कोई भी क्रिया ज्ञान के साथ किया जाता है तो मुक्ति निश्चित है। हम कोई भी धर्म अनुष्ठान करके सुख बढऩे की कामना करते है जबकि हमें पाप कम हो ऐसी कामना करना चाहिए। जीवन में विषय-कषाय को कम करने के लिए धर्म कार्य होना चाहिए। संपत्ति के प्रति स्वार्थ और स्नेह न रखने वाला ही संसार को छोड़कर सिद्ध अवस्था तक पहुंच सकता है। धर्म का पहला फल यही है कि जीवन में पुण्य बढ़ता है। इसलिए धर्म करके पुण्य नहीं मांगना चाहिए बल्कि पापों से मुक्ति और संसार से सिद्ध अवस्था की ओर गमन मांगना चाहिए। धर्म से जीवन में सद्गुणों का विकास होना चाहिए। धर्म कार्य से जीवन में विनय, सरलता, अनुशासन आदि गुणों का विकास होना चाहिए। पूर्व जन्म के पुण्य के कारण हमें साधन, सुविधा और सम्पन्नता मिली है। लेकिन अब इस जन्म में पुण्य नहीं करेंगे तो आने वाले भव में कुछ नहीं मिलेगा। हम जीवन में संसार के साधनों में सुख और शांति खोजते है जबकि परमात्मा कहते है साधन और सुविधा को छोडऩे पर ही सुख और शांति मिल सकता है। दुर्गति, दुख और दोष जीवन में सद्गुणों का नाश करते है। परमात्मा के दर्शन करते हुए जीवन में संसार के प्रति राग कम होना चाहिए और वैराग्य का भाव आना चाहिए अर्थात परमात्मा के जैसे ही बनने की भावना होनी चाहिए। धर्म से जीवन में परिवर्तन आना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो इसका कारण है हमने जीवन के लिए लक्ष्य का निर्धारण नहीं किया है।
