जब व्यक्ति स्वयं बदलेगा, तो परिवार,समाज बदलेगा और राष्ट्र भी सशक्त एवं संस्कारित बनेगा : पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायी प्रवचन में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि संसार में परिवर्तन की शुरुआत हमेशा स्वयं से होती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि समाज सुधरे, परिवार में सुख-शांति बनी रहे और राष्ट्र प्रगति करे, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं के जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं करेगा, तो केवल दूसरों से अपेक्षा करने से कोई परिवर्तन संभव नहीं है। भगवान महावीर ने सबसे पहले आत्मजागरण और आत्मशुद्धि का संदेश दिया है। उन्होंने सिखाया कि जो व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही संसार को सही दिशा देने का सामर्थ्य रखता है।
पूज्यश्री ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कोई दूसरा व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकार हैं। जब तक इन विकारों पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक जीवन में शांति और आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन आत्मचिंतन करे, अपनी गलतियों को स्वीकार करे और उन्हें सुधारने का प्रयास करे, तो उसका व्यक्तित्व स्वतः ही निखरने लगेगा। आत्मसुधार ही सच्ची साधना है और यही भगवान महावीर के उपदेशों का सार है।
उन्होंने कहा कि परिवार समाज की पहली पाठशाला है और माता-पिता उसके प्रथम शिक्षक हैं। यदि घर में धर्म, संस्कार, प्रेम, अनुशासन और परस्पर सम्मान का वातावरण होगा तो बच्चे भी वही सीखेंगे। लेकिन यदि परिवार में कटुता, स्वार्थ, क्रोध और असंयम होगा, तो उसका दुष्प्रभाव समाज पर भी दिखाई देगा। इसलिए प्रत्येक परिवार को अपने घर में सत्य, अहिंसा, क्षमा, संयम और सदाचार का वातावरण बनाना चाहिए। संस्कारित परिवार ही संस्कारित समाज की नींव होते हैं।
पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि आज समाज में बढ़ती अशांति, तनाव, पारिवारिक विघटन और नैतिक मूल्यों में गिरावट का सबसे बड़ा कारण धर्म और संस्कारों से दूरी है। आधुनिकता को अपनाना गलत नहीं है, लेकिन यदि आधुनिकता के साथ नैतिकता और आध्यात्मिकता नहीं होगी तो जीवन अधूरा रह जाएगा। इसलिए नई पीढ़ी को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि भगवान महावीर के आदर्शों, जिनवाणी, गुरु भगवंत और धर्म के संस्कारों से भी जोड़ना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि समाज किसी एक व्यक्ति या संस्था से नहीं बदलता, बल्कि प्रत्येक नागरिक के सदाचार और चरित्र से बदलता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह किसी की निंदा नहीं करेगा, असत्य नहीं बोलेगा, किसी का अहित नहीं सोचेगा, जरूरतमंद की सहायता करेगा और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करेगा, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः दिखाई देने लगेगा। धर्म का वास्तविक स्वरूप व्यवहार में दिखाई देना चाहिए, केवल वाणी में नहीं।
पूज्यश्री ने आगे कहा कि भगवान महावीर ने अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह का जो संदेश दिया, वह आज के समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। यदि मनुष्य दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीख जाए, क्रोध के स्थान पर क्षमा को अपनाए, संग्रह की प्रवृत्ति छोड़कर संतोष का जीवन जिए और सभी जीवों के प्रति करुणा रखे, तो समाज में प्रेम, भाईचारा और सद्भाव का वातावरण स्थापित होगा। यही महावीर भगवान की सच्ची आराधना है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल सीमाओं, भवनों और संसाधनों से महान नहीं बनता, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, संस्कार और नैतिक मूल्यों से महान बनता है। जिस राष्ट्र के नागरिक सत्यनिष्ठ, अनुशासित, कर्तव्यपरायण और धर्मनिष्ठ होते हैं, वह राष्ट्र विश्व में सम्मान प्राप्त करता है। इसलिए राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार व्यक्ति निर्माण है और व्यक्ति निर्माण का आधार धर्म एवं संस्कार हैं।
प्रवचन के अंत में पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि चातुर्मास के इस पावन काल में प्रत्येक व्यक्ति कम से कम एक अवगुण का त्याग और एक सद्गुण को अपनाने का संकल्प अवश्य ले। यदि हम स्वयं बदलने का प्रयास करेंगे तो हमारा परिवार बदलेगा, परिवार से समाज बदलेगा और समाज से राष्ट्र सशक्त, समृद्ध, संस्कारित एवं आदर्श बनेगा। यही भगवान महावीर के सिद्धांतों का वास्तविक संदेश है और यही मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता भी है।
