रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं, आत्मा की रक्षा का भी संदेश देता है
रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कहा—सच्ची रक्षा बाहरी बंधन से नहीं, संयम, सदाचार और शुभभावों से होती है

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सानिध्य में प्रतिदिन धर्मसभा एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हो रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर धर्मसभा में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने रक्षा के वास्तविक अर्थ को समझाते हुए कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का पर्व नहीं है, बल्कि यह हमें अपने जीवन में अच्छे संस्कारों, सदाचार और संयम की रक्षा करने का संदेश भी देता है।
उन्होंने कहा कि राखी का धागा बहुत छोटा होता है, लेकिन उसके पीछे छिपी भावना बहुत बड़ी होती है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो उसके भीतर प्रेम, विश्वास और मंगलकामना होती है। भाई भी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है। लेकिन जैन दर्शन हमें इससे आगे बढ़कर यह सोचने की प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर के सद्गुणों की रक्षा कैसे करें।
सबसे पहले अपने मन की रक्षा करें
रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कहा कि आज मनुष्य अपने घर, धन, परिवार और संपत्ति की सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित रहता है, लेकिन अपने मन की सुरक्षा के प्रति उतना जागरूक नहीं है।
उन्होंने कहा कि मन में क्रोध प्रवेश कर जाए तो विवेक की रक्षा नहीं रहती, लोभ बढ़ जाए तो संतोष की रक्षा नहीं रहती और अहंकार बढ़ जाए तो विनय की रक्षा नहीं रहती। इसलिए जीवन में सबसे पहली रक्षा अपने मन और भावों की करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर यह संकल्प लेना चाहिए कि वह क्रोध से अपने विवेक की, लोभ से अपने संतोष की, अहंकार से अपनी विनम्रता की और द्वेष से अपने प्रेम की रक्षा करेगा।
राखी का धागा दे शुभभावों का संदेश
साध्वी श्री ने कहा कि रक्षाबंधन के दिन कलाई पर बंधने वाला धागा हमें केवल रिश्ते की याद न दिलाए, बल्कि यह भी याद दिलाए कि जीवन में प्रेम, विश्वास, क्षमा और करुणा का बंधन मजबूत होना चाहिए।
भाई-बहन का रिश्ता केवल एक जन्म का संबंध नहीं, बल्कि प्रेम और संस्कारों की सुंदर अभिव्यक्ति है। परिवार में यदि प्रेम, सम्मान और क्षमा का भाव बना रहे तो घर स्वयं सुख और शांति का मंदिर बन जाता है।
जैन धर्म में आत्मरक्षा का अर्थ
प्रवचन में उन्होंने कहा कि जैन धर्म में सबसे बड़ी रक्षा आत्मा को पाप और कषायों से बचाना है। किसी जीव को कष्ट न देना, असत्य से बचना, चोरी न करना, संयमित जीवन जीना और मन में किसी के प्रति वैर न रखना—यही आत्मा की सच्ची रक्षा है।
उन्होंने कहा कि बाहरी सुरक्षा के साधन हमें कुछ समय तक सुरक्षित रख सकते हैं, लेकिन संयम और सदाचार मनुष्य को भीतर से सुरक्षित बनाते हैं।
बहन की राखी और साध्वी का संदेश
उन्होंने कहा कि बहन भाई की कलाई पर राखी बांधकर कहती है कि हमारा रिश्ता हमेशा प्रेम से जुड़ा रहे। उसी प्रकार साध्वी भगवंतों का संदेश है कि हर व्यक्ति अपने जीवन को धर्म की डोर से बांधे।
क्रोध आए तो क्षमा की राखी बांधिए,
लोभ आए तो संतोष की राखी बांधिए,
अहंकार आए तो विनय की राखी बांधिए,
द्वेष आए तो मैत्री की राखी बांधिए और
मोह आए तो आत्मचिंतन की राखी बांधिए।
यही रक्षाबंधन का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश है।
रिश्तों में प्रेम हो, अधिकार नहीं
रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कहा कि रिश्तों में प्रेम होना चाहिए, लेकिन अत्यधिक अधिकार और अपेक्षा नहीं। जब रिश्तों में अपेक्षाएं बढ़ती हैं तो छोटी-छोटी बातें मन को दुख पहुंचाने लगती हैं। इसके विपरीत यदि रिश्तों में समझ, क्षमा और त्याग का भाव हो तो परिवार में सुख और शांति बनी रहती है।
उन्होंने कहा कि भाई-बहन का रिश्ता हमें निस्वार्थ प्रेम और एक-दूसरे के सुख की कामना करना सिखाता है।
रक्षा का सबसे बड़ा संकल्प—किसी को दुख न देना
प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर केवल एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प लेने के साथ यह भी संकल्प लेना चाहिए कि हमारे कारण किसी जीव को दुख न पहुंचे। हमारी वाणी किसी के हृदय को चोट न पहुंचाए, हमारे कर्म किसी के लिए पीड़ा का कारण न बनें और हमारे मन में किसी के प्रति दुर्भावना न रहे।
यही अहिंसा और करुणा की भावना जैन धर्म की मूल शिक्षा है।
प्रवचन के समापन पर रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कहा कि राखी की डोर कलाई पर बंधती है, लेकिन उसका संदेश हृदय तक पहुंचना चाहिए। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर के विकारों से अपनी आत्मा की रक्षा करना सीख जाएगा, उसी दिन रक्षाबंधन का पर्व उसके लिए वास्तविक अर्थों में सार्थक हो जाएगा।
धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने भावपूर्वक प्रवचन का श्रवण किया। रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर साध्वी भगवंतों के सानिध्य में श्रद्धालुओं ने प्रेम, क्षमा, संयम, अहिंसा, सदाचार और आत्मकल्याण को जीवन में अपनाने का संदेश प्राप्त किया।