तप से जीवन में आता है संयम, त्याग और आत्मिक शांति — साध्वी रत्ननिधि श्री जी
अक्षय निधि तप के आध्यात्मिक महत्व पर धर्मसभा में हुआ विशेष प्रवचन

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी म.सा. की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी म.सा. की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा-4 के सानिध्य में चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन धर्मसभा, प्रवचन एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हो रहे हैं। धर्मसभा में जैन अक्षय निधि तप के आध्यात्मिक महत्व पर विशेष प्रवचन हुआ। साध्वी रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि जैन धर्म में तप का विशेष महत्व है। तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, वासनाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए आत्मा को निर्मल बनाने की साधना है। तप के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर करने और कर्मों की निर्जरा करने की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार की इच्छाओं और मोह-माया से घिरा हुआ है। व्यक्ति जितना अधिक भौतिक वस्तुओं के पीछे भागता है, उतना ही वह अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता जाता है। जैन दर्शन हमें बाहरी सुखों के बजाय आत्मिक सुख की ओर बढऩे की प्रेरणा देता है। तप इसी आत्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण साधन है। साध्वीश्री ने अक्षय निधि तप की महत्ता बताते हुए कहा कि यह साधना व्यक्ति के भीतर त्याग, संयम, सहनशीलता और आत्मविश्वास को मजबूत करती है। तप के दौरान साधक अपनी दैनिक इच्छाओं और सुविधाओं का त्याग करते हुए आत्मकल्याण की ओर कदम बढ़ाता है। साध्वीश्री ने कहा कि जैन धर्म हमें यह संदेश देता है कि संसार में प्राप्त होने वाली भौतिक संपत्ति हमेशा साथ नहीं रहती। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा सभी परिवर्तनशील हैं, लेकिन आत्मा के लिए किए गए अच्छे कर्म, संयम और साधना का महत्व कहीं अधिक है। यही वास्तविक आध्यात्मिक निधि है, जिसे कोई बाहरी परिस्थिति समाप्त नहीं कर सकती। अक्षय निधि तप के माध्यम से तपस्वी अपने जीवन में अनुशासन और संयम को मजबूत करता है। साध्वीश्री ने कहा कि तप करने वाले प्रत्येक साधक के पीछे उसकी दृढ़ श्रद्धा और आत्मकल्याण की भावना होती है। तप व्यक्ति को यह सिखाता है कि हर इच्छा को पूरा करना आवश्यक नहीं है। कई बार किसी इच्छा को त्याग देना ही वास्तविक स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा कि तप हमें सहनशीलता भी सिखाता है। जीवन में सुख और दुख दोनों आते-जाते रहते हैं। जो व्यक्ति संयम और समता का अभ्यास करता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन को स्थिर रख सकता है। जैन साधना का उद्देश्य भी मनुष्य को ऐसी ही समता और आत्मिक स्थिरता की ओर ले जाना है। धर्मसभा के दौरान साध्वीश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि आज उसने ऐसा कौन-सा कार्य किया जिससे उसकी आत्मा का कल्याण हो।


