संसार में बड़े से बड़े पदों को प्राप्त करना सरल है जबकि परमात्मा का श्रावक बनना बहुत कठिन है – प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से बताया कि श्रावक किसे कहते है? जो जिनशासन को मानता है जो परमात्मा की वाणी पर श्रद्धा रखते है उसे श्रावक कहते है। जो परमात्मा की सुनता है परमात्मा ने जीवमात्र के कल्याण के लिए जो कहा उसे मानता है वहीं श्रावक है। श्रद्धा, विवेक और क्रिया जिसके जीवन में आ जाता है उसे सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र प्राप्त हो जाता है। वह श्रावक कहलाता है। संसार में बड़े से बड़े पदों को प्राप्त करना सरल है जबकि परमात्मा का श्रावक बनना बहुत कठिन है। वास्तव में श्रावक वह होता है जिसकी दिशा वही है जो दिशा पंच परमेष्ठि की है। अर्थात परमात्मा के दिशा की ओर हमारी भी दिशा हो वहीं श्रावक होने की योग्यता रखता है। अगर हमारी और परमात्मा की दिशा एक हो जाए तो अंत में दशा भी एक हो सकती है अर्थात हम भी कभी न कभी परमात्मा बन सकते है। हम संसार के वस्तुओं में सुख खोजने का काम करते है। जबकि ज्ञानीभगवंत संसार के वस्तुओं को केवल एक साधन मानते है जिसकी सहायता से हम संसार को कम भी कर सकते है और बढ़ा भी सकते है। अर्थात वस्तुओं का उपयोग करते हुए हम परमात्मा की दिशा में चले तो संसार कम हो सकता है और विपरीत दिशा में चले संसार भ्रमण बढ़ सकता है। अब हमें स्वयं के अंदर झांकना है जांच करना है कि वास्तव में हम श्रावक है या केवल श्रावक बनने का केवल दिखावा कर रहे है । अगर हम जिनशासन के सच्चेचौर अच्छे श्रावक आजतक नहीं बन पाए है ये चातुर्मास काल हमारे लिए एक सुअवसर लेकर आया है। इस अवसर का हमे ऐसा लाभ उठाना है कि जिनवाणी और जिनेश्वर परमात्मा के ओ अति हमारे अंतरहृदय में श्रद्धा हो जाए और हम भी भगवान महावीर के एक अच्छे और सच्चे श्रावकों की गिनती में आ सके।
