हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ की हरियाली, संस्कृति और सामाजिक एकता का उल्लास
कल जिले में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा हरेली तिहार, एक पेड़ मां के नाम पर होगा पौधरोपण

धमतरी। छत्तीसगढ़ सहित धमतरी जि़ले में कल गुरुवार को हरेली तिहार उत्साह के साथ मनाया जाएगा । ग्रामीणों व किसान खेती-किसानी से जुड़े औजारों की पूजा करेंगे । इस मौके लोग एक पेड़ माँ के नाम से भी लगायेंगे।धमतरी जिले में खासकर ग्रामीण इलाकों में यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
धार्मिक आस्था और लोक परंपरा का मिलन
हरेली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक परंपरा का जीवंत रूप है। इस दिन हल, गैंती, कुदाल जैसे कृषि औजारों की पूजा की जाती है। किसान इन्हें सजाकर धूप-दीप दिखाते हैं। यह कर्म न केवल प्रकृति और औजारों के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है, बल्कि जीवन की बुनियादी विनम्रता को भी प्रकट करता है। गौरी-गौरा की पूजा, महिलाएं पारंपरिक गीतों और पकवानों के साथ करती हैं, जिसमें मातृशक्ति की पूजा और पारिवारिक समरसता की कामना समाहित होती है।
प्रकृति संरक्षण का लोक संदेश
हरेली तिहार केवल धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं, बल्कि यह पर्यावरण चेतना का भी प्रतीक बन चुका है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा की गई एक पेड़ माँ के नाम अपील, इस त्यौहार को हरियाली के प्रतीक से आगे बढ़ाकर हरित क्रांति के संकल्प से जोड़ती है।
खेल, पकवान और उल्लास
हरेली तिहार का सबसे रंगीन पहलू है—गांव-गांव में गूंजते पारंपरिक खेल और व्यंजन। गेंड़ी चढऩा, बच्चों और युवाओं के लिए साहस और संतुलन की परीक्षा है, जो उत्साह और मस्ती से भरा होता है। खो-खो, कबड्डी जैसे खेल गांव की मिट्टी से जुड़ी ऊर्जा को पुन: जीवित करते हैं। वहीं, रसोई घरों से आती चीला, खुरमी, फरहा, बबरा और ठेठरी की खुशबू न केवल स्वाद को जगाती है, बल्कि घर के भीतर प्रेम और सामूहिकता की भावना को गाढ़ा करती है।
नवयुग के लिए पुरातन का संदेश
आज जब आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं, तब हरेली तिहार हमें फिर से हमारी मिट्टी, हमारे पूर्वजों और हमारी परंपराओं की ओर लौटने का निमंत्रण देता है। यह पर्व आने वाली पीढिय़ों को यह सिखाता है कि विकास की असली नींव प्रकृति, परिश्रम और परंपरा में ही है।
