बड़ों के प्रति आदर और छोटों के प्रति स्नेह का भाव होना चाहिए – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज के प्रवचन का विषय है। रिश्तों की डोर, सुख की ओर, जीवन में गुणों के कारण सुवास आ जाए और घर महकते रहना चाहिए। ऐसा अपना घर होना चाहिए। जहां कथनी और करनी एक जैसी हो अर्थात उसमें कोई अंतर न हो ऐसा घर होना चाहिए। घर में विनय, विवेक की नींव हो, प्रेम और प्यार की छत हो, सभी से हमारा मधुर व्यवहार होना चाहिए। मर्यादा और अनुशासन होना चाहिए। ऐसे घर में विघटन कभी न हो। मर्यादा की चार दिवारी में घर के सभी सदस्य मर्यादित रहे। सादा जीवन और उच्च विचार से सभी प्रभावित हो। सभी बड़ों के प्रति आदर का भाव और छोटों के प्रति स्नेह का भाव होना चाहिए। सेवा और सहयोग का सुंदर दरवाजा हो। साथ ही जहां चित्र नहीं चरित्र की पूजा ऐसे घर में हो। सभी सदस्य हमेशा धर्म के सम्मुख रहे। और मन में पापों से डर होना चाहिए। गौतम से महावीर प्रभु कहते है कि अपना शाश्वत घर होना चाहिए। आगे कहा कि चातुर्मास काल में जिनवाणी के माध्यम से यह समझने का प्रयास कर रहे है कि अपने जीवन का उद्धार कैसे हो। गुरु भगवन्तों से यह रहस्य समझने का प्रयास कर रहे है कि जीवन से दुख कैसे दूर हो। परिवार में कैसे रहना चाहिए। परिवार के साथ कैसे जीना है। वास्तव में हमे समूह में जीना सीखना है। जब दो या दो से अधिक व्यक्ति साथ में जीना सिख लेते है तो हम उसे परिवार या संगठन या समूह में जीना मान लेते है। जैन दर्शन के अनुसार पहले तीर्थंकर परमात्मा आदिनाथ भगवान ने परिवार के साथ अर्थात समूह में जीना सिखाया। उस समय कल्पवृक्ष होता था जो लोगों की इच्छाओं को पूरा करता था। किंतु धीरे धीरे समय के प्रभाव के कारण कल्पवृक्ष भी लोगो की इच्छाओं को पूरा करने में कमी करने लगा। इस समस्या को परिवार या समूह के रूप में जीना सीखाकर परमात्मा ने दूर किया। क्योंकि जब लोगो के जीवन को आवश्यकता पूरी नहीं होती तो कलह होता अव्यवस्था होती। यही सोचकर परमात्मा ने परिवार की व्यवस्था प्रारंभ की। यहां दो या दो से अधिक लोग मिलकर एक दूसरे के सहयोग से अपनी आवश्यकता को पूरा करते है।
