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11 फरवरी 2011 से पूर्व नियुक्त कक्षा 1–8 के शिक्षकों को टेट अनिवार्यता से किया जाये छूट प्रदान

सर्व समाज समन्वय महासभा जिला धमतरी छत्तीसगढ़ ने ज्ञापन सौंप की मांग

 

सर्व समाज समन्वय महासभा, जिला धमतरी की अध्यक्ष पदमनी चंद्राकर, जिला संयोजक दिलीप पटेल एवं कार्यकारिणी द्वारा आज जिला कलेक्टर, धमतरी को एक विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा गया तथा अनुरोध किया गया कि उक्त प्रतिवेदन को प्रधानमंत्री एवं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के समक्ष प्रेषित किया जाए।महासभा ने अपने प्रतिवेदन में उल्लेख किया है कि वर्ष 2009 में प्रवर्तित राइट ऑफ़ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन एक्ट , 2009 की धारा 23 के अंतर्गत नेशनल कौंसिल फॉर टीचर एजुकेशन को शिक्षकों की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने का अधिकार प्रदान किया गया, जिसके अनुपालन में वर्ष 2010–2011 में शिक्षक पात्रता परीक्षा को अनिवार्य योग्यता के रूप में अधिसूचित किया गया।महासभा का मत है कि 11 फरवरी 2011 से पूर्व कक्षा 1 से 8 तक के वे शिक्षक, जो उस समय प्रचलित भर्ती नियमों के अनुसार विधिसम्मत रूप से नियुक्त हुए थे तथा जिन्होंने नियुक्ति के समय निर्धारित शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण योग्यताएँ पूर्ण कर ली थीं, उन्हें पश्चातवर्ती रूप से लागू की गई टेट अनिवार्यता से मुक्त किया जाना न्यायसंगत एवं विधिसम्मत होगा।महासभा ने यह भी प्रतिपादित किया कि ऐसे शिक्षकों ने दीर्घकाल से सेवा प्रदान की है, अनेक शिक्षकों ने सेवा-कालीन प्रशिक्षण भी पूर्ण किया है, तथा उनकी कार्यकुशलता एवं अनुभव शिक्षा व्यवस्था की निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण हैं। सेवा-शर्तों में परिवर्तन सामान्यतः भविष्यगत प्रभाव से लागू किए जाने चाहिए.यह विधि का स्थापित सिद्धांत है। पूर्व प्रभाव से नई अनिवार्यता लागू किए जाने से संवैधानिक समानता एवं प्रशासनिक न्याय के प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं।प्रतिवेदन में “ग्रैंडफ़ादर क्लास” के सिद्धांत के अनुरूप 11 फरवरी 2011 से पूर्व विधिसम्मत रूप से नियुक्त शिक्षकों को संरक्षण प्रदान करने की मांग की गई है, ताकि देशभर में एकरूप नीति निर्धारण हो सके और शिक्षकों, प्रशासन एवं समाज के मध्य अनिश्चितता की स्थिति समाप्त हो।सर्व समाज समन्वय महासभा के जिला सचिव चन्द्रकला पटेल, सदस्यगण रेणुका नाडेम,विजय पदमवार, रूखमणी सोनकर, राजकुमारी पटेल, ललित चंद्राकर ने जिला कलेक्टर से निवेदन किया है कि उक्त विषय की गंभीरता एवं व्यापक सामाजिक प्रभाव को दृष्टिगत रखते हुए प्रतिवेदन को प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री तक शीघ्र प्रेषित किया जाए तथा राष्ट्रीय स्तर पर एक स्पष्ट एवं एकरूप नीति बनाए जाने हेतु आवश्यक पहल की जाए।

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