चार बसो में सवार होकर 200 धीवर समाजजन लव – कुश की जन्म स्थली का दर्शन करने गए तुरतुरिया धाम
शीतला माता मंदिर परिसर से महापौर रामू रोहरा ने धर्म ध्वजा दिखाकर समाजजनों को किया रवाना

धीवर समाज के लोग हर साल नवरात्र में करते हैं सामूहिक रूप से तीर्थयात्रा
धमतरी। धीवर समाज में चैत्र नवरात्र महोत्सव की धूम है। दानीटोला स्थित मां शीतला मंदिर में रोजाना विविध हा कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। इस बीच शनिवार को धीवर समाज के करीब 200 महिला, पुरुष और बच्चे चार बसो में सवार होकर धार्मिक तीर्थयात्रा में रवाना हुए। सुबह करीब 9:30 बजे शहर के प्रथम नागरिक महापौर रामू रोहरा मन को शीतलता देने वाली मां शीतला मंदिर पहुंचे और देवी मां की विशेष पूजा अर्चना की। इसके पश्चात धीवर समाज के प्रतिनिधियों को तुरतुरिया मंदिर तीर्थयात्रा के लिए धर्म ध्वजा दिखाकर रवाना किया। महापौर रामू रोहरा ने कहा कि धीवर समाज की एकता और आपसी सद्भावना की धमतरी शहर में मिसाल है। समाजजन हर साल नवरात्र के मौके पर सामूहिक रूप से तीर्थयात्रा करते हैं और समाज की खुशहाली के लिए कामना करते हैं। इस अवसर पर धीवर समाज के अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद जगबेड़ा, संरक्षक परमेश्वर फुटान, होरीलाल मत्स्यपाल, सोहन धीवर, सोनू लाल नाग, फिरोज हिरवानी, शैलेंद्र नाग, खूबलाल धर्मगुड़ी, गजेश कोसरिया, राजू ओझा, लेखराम नाग, करण हिरवानी, नितेश हिरवानी, राजा कोसरिया, पप्पू कोसरिया, धृति हिरवानी, आशा धीवर, संगीता कोसरिया, पार्षद तल्लीनपुरी गोस्वामी, अखिलेश सोनकर, कुलेश सोनी, अज्जू देशलहरे, ईश्वर सोनकर समेत बड़ी संख्या में धीवर समाज के लोग शामिल थे।
तुरतुरिया धाम क्यों प्रसिद्ध है
धीवर समाज के मीडिया प्रभारी शैलेंद्र नाग ने बताया कि छत्तीसगढ़ के बलौदाबाज़ार जिले में स्थित तुरतुरिया मुख्य रूप से महर्षि वाल्मीकि के आश्रम और लव-कुश की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि रामायण काल में माता सीता ने यहीं वनवास का समय बिताया था। यह स्थान सुरसुरी गंगा नदी के तट पर चट्टानों से ‘तुरतुर’ की आवाज़ के साथ गिरते प्राकृतिक जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है। समाज के संरक्षक परमेश्वर फ़ुटान ने
तुरतुरिया धाम की पौराणिक महत्व बताय। उन्होंने बताया कि तुरतुरिया को भगवान श्रीराम में पुत्र लव-कुश की जन्मस्थली माना जाता है। इसी स्थान पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहाँ माता सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था।
उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक गोमुख और जलकुंड है। यहाँ चट्टानों के बीच से एक गोमुख से लगातार पानी गिरता रहता है, जिससे ‘तुर-तुर’ की ध्वनि आती है। इसे ‘सुरसुरी गंगा’ भी कहते हैं। सोहन धीवर, युवा लेखराम नाग ने बताया कि यह एक पुरातत्विक स्थल है। यहाँ 8-9वीं शताब्दी के प्राचीन शिव मंदिर, पत्थर के स्तंभ, शिलालेख और मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
पर्यटन व प्रकृति का संगम
बता दे कि यह स्थान बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य के पास घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा एक खूबसूरत पर्यटन स्थल है।