Uncategorized

गुरु के सान्निध्य से ही जीवन को मिलती है सही दिशा : पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

पूर्णिमा के पावन अवसर पर पाश्र्वनाथ जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों का शुभारंभ


धमतरी। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर इतवारी बाजार स्थित पाश्र्वनाथाय जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों का शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ हुआ। गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर गुरु वंदन, जिनवाणी श्रवण एवं धर्म आराधना का लाभ प्राप्त किया। अपने मंगल प्रवचन में पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अपने जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिव्य अवसर है। गुरु वह प्रकाश हैं जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। जिस व्यक्ति के जीवन में सच्चे गुरु का मार्गदर्शन होता है, उसका जीवन सदैव धर्म, संयम और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ता है। पूज्यश्री ने कहा कि आज संसार में भौतिक सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन मन की शांति कम होती जा रही है। इसका कारण धर्म से दूरी और गुरु के उपदेशों की उपेक्षा है। यदि मनुष्य अपने जीवन में गुरु के बताए मार्ग पर चलना प्रारंभ कर दे तो परिवार में प्रेम, समाज में एकता और जीवन में संतोष स्वत: आ जाता है।उन्होंने जैन समाज को संबोधित करते हुए कहा कि चातुर्मास आत्मजागरण का पर्व है। यह समय केवल प्रवचन सुनने का नहीं, बल्कि अपने जीवन में परिवर्तन लाने का अवसर है। प्रत्येक श्रावक-श्राविका को क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को कम करने का संकल्प लेना चाहिए। धर्म तभी सार्थक है जब वह हमारे व्यवहार, वाणी और विचारों में दिखाई दे। पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि समाज की सबसे बड़ी पूंजी उसके संस्कार हैं। यदि नई पीढ़ी को जिनवाणी, नवकार मंत्र, मंदिर, गुरु भगवंत और धर्म आराधना से जोड़ दिया जाए, तो समाज का भविष्य सुरक्षित रहेगा। माता-पिता का पहला दायित्व है कि वे बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक संस्कार भी दें। संस्कारित पीढ़ी ही समाज की वास्तविक शक्ति होती है। उन्होंने कहा कि धर्म हमें जोडऩा सिखाता है, तोडऩा नहीं; क्षमा करना सिखाता है, बदला लेना नहीं; सेवा करना सिखाता है, स्वार्थ नहीं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अहिंसा, सत्य, करुणा, मैत्री, विनम्रता और संयम जैसे गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए। यही गुण व्यक्ति, परिवार और समाज को उन्नति के मार्ग पर ले जाते हैं।पूज्यश्री ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि चातुर्मास के इस पावन काल का अधिकतम लाभ लें, प्रतिदिन प्रवचनों में उपस्थित होकर जिनवाणी का श्रवण करें, नवकार मंत्र का जाप करें, स्वाध्याय करें तथा अपने परिवार और विशेष रूप से बच्चों एवं युवाओं को भी धर्म से जोड़ें। धर्म से जुड़ा हुआ समाज ही संगठित, संस्कारित और सुरक्षित समाज का निर्माण करता है।

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!