संवत्सरी पर्व पर पाश्र्वनाथ जिनालय में हुआ मूल बारसा सूत्र का वाचन
पर्यूषण पर्व आत्मा की सफाई व कल्याण का पर्व है - परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी

धमतरी। परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा 4 का धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित है। परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने आज के प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि संवत्सरी पर्व है। अर्थात् पर्यूषण पर्व का आठवां दिन है। आज हमे बारसा सूत्र के माध्यम से परमात्मा की मुल वाणी का श्रवण करना है। जहां जहां साधु साध्वी का चातुर्मास होता है। वहां वहां मूल बारसा सूत्र का वाचन किया जाता है। इस सूत्र में 1250 गाथा है। हम सभी ने कल्पसूत्र के हिंदी अनुवाद का पूर्व के दिनों में श्रवण किया है। आज परमात्मा की मूल वाणी के श्रवण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। ज्ञानी भगवंत कहते है जो जीव बारसा सूत्र का श्रवण 3, 7, 11 या 21 बार पूरी श्रद्धा और एकाग्रता से करता है। उसका मोक्ष में जाना निश्चित हो जाता है। क्योंकि परमात्मा की वाणी को सुनने का भाव केवल भव्य जीवो का ही होता है। कोई अभव्य आत्मा के मन में ऐसा भाव ही नहीं आता है। इस आधार पर हम कह सकते है कि हम सभी भव्य आत्मा है। हमे यह जिनशासन अपनी आत्मा का कल्याण करने के लिए मिला है। यह पर्यूषण पर्व अपनी आत्मा की सफाई के लिया है। हमें देखने का प्रयास करना है कि इन आठ दिनों में हमने अपनी आत्मा की कितनी सफाई की। क्योंकि जब तक आत्मा से कर्म जुड़े रहेंगे तब तक आत्मा मोक्ष में नहीं जा सकती। आत्मा को कर्मों से मुक्त करना है अर्थात आत्मा से कर्मों को अलग करने के बाद ही मुक्ति संभव है। जब तक यह शरीर है तो कर्म का बंधन तो होगा ही। चाहे वह पुण्य कर्म का बंध हो या पाप कर्म का। तो फिर आत्मा कर्मों से मुक्त कैसे हो सकती है। इसका जवाब देते हुए ज्ञानी भगवंत कहते है कि शरीर और कर्म साथ साथ जरूर चलते रहते है लेकिन जब हम नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते है तो पूर्व के कर्मों से छुटकारा अधिक मिलता है और नए कर्मों का बंध कम होता है। और इसी तरह कर्मों से मुक्त हुआ जा सकता है। जितने भी जीव मोक्ष में जाते है वे सभी इसी तरह पुरुषार्थ करते है। इस पर्यूषण पर्व को बोलचाल में हम क्षमापना पर्व भी कहते है। पर्व के इन आठ दिनों में अपनी आत्मा के कल्याण के लिए पुरुषार्थ करते है। और फिर संवत्सरी प्रतिक्रमण करने के बाद संसार के सभी 84 लाख जीवों से क्षमायाचना करते है।