धर्म-साधना में जुटे 27 वर्षीय चेतन बरडिया:चातुर्मास में 30 दिन का कठिन उपवास, केवल गर्म पानी का किया सेवन,2 अक्टूबर को होगी पारणा

धमतरी। चातुर्मास को जैन धर्म में तप, संयम, साधना और आत्मशुद्धि का विशेष काल माना जाता है। इसी धार्मिक भावना से प्रेरित होकर सदर उत्तर वार्ड, धमतरी निवासी 27 वर्षीय चेतन बरडिया, पिता महेश बरडिया ने चातुर्मास के दौरान 30 दिनों का कठिन उपवास किया है। इस दौरान उन्होंने अन्न सहित किसी भी प्रकार के ठोस आहार का सेवन नहीं किया और केवल गर्म पानी का ही सेवन करते हुए अपनी तपस्या पूर्ण की।
चेतन बरडिया की बचपन से ही धर्म और आध्यात्म के प्रति विशेष रुचि रही है। धार्मिक संस्कारों से जुड़े परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। उनके परिवार के सदस्य भी धर्म, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि रखते हैं। परिवार से मिले धार्मिक संस्कारों और स्वयं की आस्था ने चेतन को तप-साधना के लिए प्रेरित किया।
30 दिनों तक संयम के साथ साधना
चेतन ने चातुर्मास के दौरान लगातार 30 दिनों तक उपवास का संकल्प लिया। उपवास के दौरान उन्होंने भोजन पूरी तरह त्यागकर केवल गर्म पानी का सेवन किया। यह साधना उनके लिए शारीरिक संयम के साथ-साथ मानसिक दृढ़ता और आत्मअनुशासन की भी परीक्षा रही। नियमित दिनचर्या और धार्मिक भावना के साथ उन्होंने अपने संकल्प को पूरा किया।
धार्मिक दृष्टि से तपस्या को आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का माध्यम माना जाता है। उपवास के दौरान व्यक्ति अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का प्रयास करता है। चेतन बरडिया ने भी इसी भावना के साथ 30 दिनों की तप-साधना पूरी की।
परिवार और समाज में उत्साह
चेतन की इस तपस्या की जानकारी मिलने के बाद परिवारजनों के साथ समाज के लोगों और परिचितों में भी उत्साह है। परिजनों के अनुसार बचपन से ही चेतन का झुकाव धार्मिक गतिविधियों की ओर रहा है। उनकी इस साधना को परिवार के धार्मिक संस्कारों और व्यक्तिगत आस्था का परिणाम माना जा रहा है।
30 दिनों की कठिन तपस्या पूर्ण होने के बाद अब 2 अक्टूबर को चेतन बरडिया का पारणा होगा। इस अवसर पर परिवारजनों, समाज के लोगों और शुभचिंतकों की उपस्थिति में धार्मिक विधि-विधान के साथ पारणा कराया जाएगा। पारणा को लेकर परिवार और समाजजनों में उत्साह का वातावरण है।
चेतन बरडिया की यह साधना युवाओं के बीच भी धर्म, संयम और आत्मअनुशासन के प्रति रुचि जगाने वाली है। उन्होंने अपनी तपस्या के माध्यम से यह संदेश दिया कि दृढ़ संकल्प, धार्मिक आस्था और अनुशासन के साथ कठिन साधना को भी पूर्ण किया जा सकता है।

