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दीपावली पूर्व गौरा जगार की पारंपरिक लोक परंपरा में उमड़ा श्रद्धा और उत्साह, नगर पंचायत अध्यक्ष ज्योति हरख जैन ने विभिन्न चौकों में पहुंचकर की पूजा-अर्चना

महावीर चौक, सिदारपारा, पुराना बाजार चौक एवं गणेश-शारदा चौक में शिव-पार्वती विवाह की लोक परंपरा का हो रहा भव्य आयोजन,

भखारा- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक गौरा-गौरी जागरण पर्व दीपावली के पावन अवसर पर नगर में श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। भगवान शिव एवं माता पार्वती के विवाह की इस प्राचीन लोक परंपरा को ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय सहित नगरवासी पूरे भक्तिभाव से निभा रहे हैं। नगर के विभिन्न गौरा-गौरी चौरा में आकर्षक सजावट के साथ पारंपरिक पूजा-अर्चना एवं जागरण के आयोजन किए जा रहे हैं।
इसी क्रम में नगर पंचायत अध्यक्ष श्रीमती ज्योति हरख जैन ने महावीर चौक, सिदारपारा, पुराना बाजार चौक (छोटे रानू दुकान के पास) तथा गणेश-शारदा चौक पहुंचकर गौरा-गौरी पूजन में सहभागिता की। इस अवसर पर पार्षद छबीलाल निर्मलकर, किशोर गौर, रूपेश गणपत कंवर सहित विभिन्न आयोजन समितियों के सदस्य एवं मोहल्लेवासी उपस्थित रहे। अध्यक्ष ने श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना कर नगर की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। साथ ही मोहल्लेवासियों से आत्मीय मुलाकात कर सभी को गौरा-गौरी जागरण पर्व एवं दीपावली की बधाई और शुभकामनाएं दीं।

पारंपरिक रीति-रिवाजों से होता है गौरा-गौरी विवाह

पूजनकर्ताओं ने बताया कि लक्ष्मी पूजा से लगभग पांच से सात दिन पूर्व गौरा जगाने की परंपरा प्रारंभ होती है। इस उत्सव की शुरुआत चुलमाटी की रस्म से होती है। तालाब अथवा नदी के किनारे से पवित्र कुंवारी मिट्टी लाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। लोक मान्यता एवं परंपरा के अनुसार भगवान शिव को बैल पर तथा माता गौरी को कछुए पर विराजमान स्वरूप में बनाया जाता है।
दीपावली की रात गौरा चौरा में आकर्षक मंडप सजाकर शिव-पार्वती विवाह की पारंपरिक रस्में पूरी की जाती हैं। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर गौरा गीत गाती हैं। वहीं देव सवार महिला-पुरुष पारंपरिक नृत्य करते हुए उत्सव में आध्यात्मिक उल्लास भर देते हैं।

लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक है गौरा जगार

गौरा-गौरी जागरण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के माध्यम से नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और लोकगीतों से जुड़ रही है। नगर के विभिन्न मोहल्लों में आयोजित यह पर्व आपसी सद्भाव, भाईचारे और सामूहिक सहभागिता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

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