दैनिक जीवन के समस्त कार्यों को करते हुए समय बचाकर प्रभु के नाम का सिमरन करना चाहिए -संत लोकेश कुमार
स्वामी टेऊँराम जी महाराज के चालीहा महोत्सव के सातवें दिन भी हुआ धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन

धमतरी। क्षमाशीलता को अपनाने वाले वीर एवं क्रोध को शान्त रखने वाले परम धीर सत्पुरुष स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने अपने जीवन में अत्यंत दु:ख देने वालों पर भी न तो क्रोध किया न उनकी प्रति दुर्भावना ही रखी न उनसे कभी बदला लिया बल्कि उनके मन को ही बदल दिया ऐसे परम समता संतोष एवं क्षमा की खान आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के चालीहा महोत्सव के सातवें दिन के कार्यक्रम का आयोजन कमल कुमार वाधवानी एवं अनिल वाधवानी के परिवार के द्वारा श्री प्रेम प्रकाश आश्रम परिसर में किया गया जिसमें उपस्थित सभी गुरुभक्तों के लिए भण्डारे की भी व्यवस्था की गई थी.आश्रम के सन्त लोकेश कुमार जी ने सत्संग के दौरान बताया कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की जिसमें जीवों के कल्याण के लिए एक जल की गंगा एवं ज्ञान की गंगा को प्रवाहित किया.जो गंगा प्रभु के चरणों से प्रवाहित हुई वह पृथ्वी के पवित्र देश भारत में गंगोत्री से निकल कर गंगा सागर तक बहते हुए जीवों के निस्तार के साथ साथ उनके पापों को धोकर कल्याण का महान कार्य कर रही है दूसरी जो प्रभु के मुख से ज्ञान के रूप में गंगा प्रवाहित हुई वह पवित्र वेदों में शोभा पाते हुए जीवों के कल्याण हेतु निरन्तर प्रवाहित होकर जीवों को पाप कर्म – माया के प्रताप से बचाकर शुभ कर्मों को करने हेतु प्रेरित कर रही है .आचार्य श्री ने हरिद्वार में प्रभु के चरणों से प्रवाहित गंगा माता के तट पर तपस्या की भक्ति की एवं प्रभु के मुख से निकली ज्ञान की गंगा को जीवो तक पहुंचा रहे हैं एवं लोगों को ज्ञान प्रदान कर कल्याण कर रहे हैं जैसे सड़क में दिशा निर्देश लिखे हुए बोर्ड लगे होते हैं जो राही को आगे की यात्रा की सुगमता में मदद करते है उसे भटकने से बचाकर मंजिल तक समय से पहुंचा देते हैं उसी प्रकार से मनुष्य को जीवन के पथ में गुरु दिशा निर्देश देने का काम करते हैं सच की धर्म की राह बताते हैं उस राह में चलना तो जिज्ञासु को पड़ता है जो उनके वचनों का दृढ़ता पूर्वक अपने जीवन में पालन करता है वह सुगमता से एवं समस्त पापों से बचते हुए समय पर मंजिल पर पहुंच जाता है.गुरुदेव हमें बार बार समझाते है कि यह जिंदगी मात्र दो दिन की है इसको हमे सफल करना है.हम प्रभु परमात्मा को माता के गर्भ दिए गए वचन को माया के प्रभाव के कारण भूल गए हैं उस वचन को निभाते हुए हमें ईश्वर को प्रति दिन याद करना चाहिए .दैनिक जीवन के समस्त कार्यों को करते हुए समय बचाकर प्रभु के नाम के सिमरन में लगाना चाहिए साथ ही बुरे कर्मों को छोड़ कर अच्छे कर्मों की खेती करनी चाहिए.इसके साथ हमें इस बात का भी पूरा ध्यान करना चाहिए कि जो धन हम दिन रात एक कर मेहनत से कमा रहे हैं उसका सदुपयोग कैसे हो जिससे हमारा इस लोक के साथ परलोक भी संवर जाए .जिस धन का उपयोग अपने ऊपर करेंगे वह अंग लगेगा एवं इस धन का उपयोग परोपकार में करेंगे धर्म के लिए करेंगे जरूरतमंद को दीन हीन की मदद में खर्च करेंगे इससे दान धर्म करेंगे वह संग चलेगा इसके अलावा जो धन बचेगा उसे जंग लगेगा माने व्यर्थ हो जाएगा।

