शिया समाज ने इमाम हुसैन की याद में मनाया मोहर्रम
आशूरा की विशेष नमाज़ अदा की गई, इमामबाड़े में उठाया गया ताज़िया

धमतरी। इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम को दुनिया भर के शिया मुसलमानों द्वारा शोक के रूप में मनाया जाता है। इस महीने का दसवां दिन आशूरा कहलाता है, आशूरा के दिन की विशेष नमाज अदा की जाती है। इस दिन का विशेष महत्व सभी मुस्लिमों के बीच है। मोहर्रम पर शहर के नवागांव वार्ड स्थित इमामबाड़े में 26 जून से मजलिस का सिलसिला शुरू हुआ जो 8 जुलाई तक जारी रहेगा। खतीब ए मजलिस सैयद ज़ुल्फिकार हुसैन ज़ैदी ने फरमाया कि सन् 61 हिजरी को मोहर्रम की 10 तारीख को करबला में यज़ीद की बड़ी फौज ने पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन व उनके बेटे,भतीजे, चचेरे भाई समेत 72 साथियों को 3 दिन का भूखा प्यासा रखकर क़त्ल किया था। इतना ही नहीं सबको कत्ल करने के बाद इमाम हुसैन के घर की महिलाओं बच्चों को कैद कर लिया। जिसकी याद में हर साल मोहर्रम में शिया समुदाय शोक में डूब जाता है। यजीद व उसके साथियों द्वारा की गई इस आतंकी घटना के विरोध में शोक सम्मेलन आयोजित किए जाते है। इस दौरान करबला के 72 प्यासे शहीदों की याद में अजादारों द्वारा पानी-शरबत और खाना तक़सीम किया जाता है।
क्यों हुई करबला की जंग और जंग के बाद क्या हुआ?
यजीद एक बहुत ही ज़ालिम बादशाह था, जिसकी हुकूमत कई देशों में फैली हुई थी, उसने अपने शासन में हर बुरे कामों को अपनी अय्याशियों व ज़ुल्म को इस्लाम का नाम देना चाहता था, यजीद की हर नीतियां इस्लाम व इंसानियत के खिलाफ थीं, लेकिन यजीद को पता था कि जब तक पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन उसका समर्थन नहीं करते तब तक वो अपने इरादों में कामयाब नही हो सकता, यही वजह है कि यजीद ने इमाम हुसैन का समर्थन लेने का आदेश दिया, साथ ही उसने ये फरमान भी दे दिया की यदि इमाम हुसैन उसका समर्थन नहीं करते तो उन्हें कत्ल कर दिया जाए।
इमाम हुसैन अपने घर की महिलाओं, बच्चों, भाई समेत अन्य 72 साथियों के साथ सफर में थे तभी 2 मोहर्रम को करबला के सेहरा में यजीद ने 9 लाख की फ़ौज भेजकर उन्हें घेर लिया। पास से बहने वाली नहर फुरात में पहरा लगा दिया, जिसके कारण इमाम हुसैन के खैमों में 7 मोहर्रम से पानी नही रहा!
10 मोहर्रम जिसे आशूरा के नाम से जाना जाता है, उस दिन सुबह से यजीद की फ़ौज ने जंग शुरू कर दी। और शाम तक 3 दिन के भूखे प्यासे इमाम हुसैन समेत उनके 72 परिवार वाले व साथी शहीद कर दिये गए। यजीदी फौज इतनी ज़ालिम थी कि उसने इमाम हुसैन के 6 माह के बेटे अली असगर को भी पानी नही पीने दिया और 3 भाल वाले तीर से उन्हें भी कत्ल कर दिया।
दूसरे दिन सुबह महिलाओं को कैद करके यजीद की राजधानी दमिश्क़ सीरिया लेकर जाया गया, इस सफर के दौरान कई बच्चे शहीद हो गए। बाकियों को शाम के कैद खानों में कैद कर दिया गया।
ताज़िया उठाया गया….
नवागांव वार्ड स्थित इमामबाड़े में बीते 25 सालों की तरह इस साल भी आशुरे के दिन ताज़िए उठाए गए, ये ताज़िए करबला स्थित इमाम हुसैन के रौज़े के प्रतीक के रूप में बनाए जाते हैं। नौहाख्वानी के साथ ही मातमदारी भी की गई। इस दौरान सैयद अबरार हुसैन ज़ैदी, सैयद अब्बास अली, शौकत अली, मुख़्तार हुसैन, सैयद जावेद हुसैन, अमजद अली, वाहिद अली, वज़ीर अली आदि उपस्थित रहे।

