श्री पार्श्वनाथ जिनालय में मनाया गया परमात्मा नेमीनाथ भगवान का दीक्षा कल्याणक महोत्सव
चातुर्मास के तहत रोजाना जारी है प्रवचन

परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्म योगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पार्श्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आबाल ब्रम्हचारी नेमीनाथ परमात्मा का जन्मकल्याणक महोत्सव कल मनाया गया।आज परमात्मा नेमीनाथ भगवान का दीक्षा कल्याणक है आज के ही दिन छगनलाल जी महाराज साहेब की पुण्यतिथि भी मनाई जाती है। वे दीर्घ तपस्वी थे। 52 उपवास की तपस्या के साथ आपका आज के दिन ही देवलोक गमन हुआ।तीसरा आज के दिन को खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभ सागर सुरीश्वर जी महाराज साहेब ने आज के दिन को खतरगच्छ दिवस घोषित किया था। इसलिए भी आज का दिन विशेष है।
आचार्य श्री जिनचंद्र सुरी जी महाराज साहेब ने संवेग ग्रन्थ लिखा। आचार्य अभयदेव सुरी जी ने दुर्लभ आगमों की टीका की। आपके द्वारा 9 अंगों की टीका की गई। जब जीवन में लगे कि अब संयम से शरीर का पालन संभव नहीं है। ऐसा विचार करते हुए शरीर को आहार पानी देना बंद कर देना। और समाधि मृत्यु का प्रयास अर्थात अनशन करना। आपके द्वारा जयतिहुवन स्तोत्र की रचना की गई।दूसरे दादा मणिधारी श्री जिनचंद्र सुरी जी महाराज साहेब ने छह वर्ष की उम्र में दीक्षा ले ली थी। और 8 वर्ष की उम्र में आपकी योग्यता को देखकर आचार्य की पदवीं दी गई।दादा श्री जिन कुशलसुरी जी हुए। 9 वर्ष की उम्र में अपने संयम जीवन स्वीकार किया। आपने विशेष रूप से उस समय लोगो को व्यसन मुक्ति के लिए प्रेरित किया। आपने 50000 नूतन श्रावक बनाए। काले गोरे भैरू आपकी सेवा में हमेशा उपस्थित रहते थे। दादा कुशल सूरी गुरुदेव को प्रकट प्रभावी कहा जाता है। पाकिस्तान के देराउर में आपका देवलोक गमन हो गया। देवलोक गमन के बाद भी एक भक्त को आपने पूर्णिमा की रात्रि में दर्शन दिए। आपका वह पद चिन्ह आज भी मालपुरा तीर्थ में है। और वह जन जन की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
जिनपद्म सुरी जी महाराज साहेब खरतरगच्छ परंपरा में हुए। आपको प्रवचन देने की विशेष कला नहीं थी।उनके द्वारा साधना के विशेष बल से जिनशासन की प्रभावना की गई।विनयप्रभ उपाध्याय द्वारा गौतमरास की रचना की है। एक ही रात्रि में आपके द्वारा 1300 गाथा याद किया गया था। इसके बाद अकबर प्रतिबोधक दादा श्री जिनचंद्र सुरी जी महाराज साहेब हुए। 9 वर्ष की उम्र में आपकी दीक्षा हुई। इसके बाद आनंदघन जी महाराज साहेब हुए। उनका संपर्क यशोविजय जी महाराज साहेब से हुआ। काशी के पंडितों द्वारा यशोविजय जी महाराज साहेब को तार्किक शिरोमणि की पदवीं दी गई थी। जिनशासन की महान प्रभावना आपके द्वारा की गई। समय सुंदर जी महाराज साहेब हुए। अपने एक ही वाक्य के 10 लाख अर्थ दिए।जिन जिन आचार्य भगवन्तों गुरु भगवन्तों ने जिनशासन की प्रभावना के लिए योगदान दिए आज उन सभी को याद करने का अवसर है।

