साधन,सुविधा के संग्रह का सदुपयोग ही संसार से मुक्ति तक पहुंचा सकता है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि चातुर्मासकाल के एक माह के साथ साथ जीवन का भी एक माह और बीत चुका है। इस चातुर्मासकाल में कुछ ऐसा लेकर जाना है जिससे आने वाला भव सुधर सके। उत्तराध्ययन सूत्र का चौथा अध्ययन है असंस्करित। परमात्मा कहते है आत्मा शाश्वत है लेकिन शरीर नहीं। इसलिए शरीर और आत्मा का संयोग भी शाश्वत नहीं है। समय भयंकर है क्योंकि इसे पकड़ नहीं सकते। समय के तीन भाग है भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल। भूतकाल सपना है, वर्तमानकाल अपना है, भविष्यकाल कल्पना है। हम जब भी खाली समय में कुछ सोचते है या तो भूतकाल के बारे में याद करते है या फिर भविष्य काल के बारे में सोचते है। जबकि भूतकाल को चाहकर भी बदल नहीं सकते। और भविष्यकाल को वर्तमान में ला नहीं सकते। उसके बाद भी हम वर्तमानकाल में नहीं जीते है। हम भूतकाल को पकड़ नहीं सकते, भविष्य को देख नहीं सकते उसके बाद भी वर्तमान में जीना नहीं चाहते। इसीलिए परमात्मा समय को भयंकर कहते है। इसलिए जीवन से जाते हुए समय के साथ साथ प्रमाद को दूर करने का प्रयास करना है। ताकि आत्मा के विकास का पुरुषार्थ कर सके। इसके लिए जीवन में परोपकार को लाना है। परोपकार अर्थात दूसरों पर उपकार करना। जो सामग्री हमने अपने उपयोग के लिए संग्रह किया है उसे दूसरों के लिए अर्थात परोपकार के लिए उपयोग करो। इससे अपना स्वार्थ कम होगा और पुण्य का बंध होगा। साधन,सुविधा के संग्रह का सदुपयोग ही संसार से मुक्ति तक पहुंचा सकता है। जीवन से राग को कम करने के लिए परोपकार करना है। श्रावक को द्रव्य का दान करना चाहिए, जबकि साधु ज्ञान का दान करते है। क्योंकि साधु द्रव्य का पहले ही त्याग कर चुके है। वस्तुओं का राग और जीवन में प्रमाद हमे श्रावक जीवन से साधु जीवन को ओर आगे बढऩे नहीं देता। इसलिए जिनशासन में सात क्षेत्र में दान करने को कहा गया है। हमें अपने जीवन में स्वार्थ से निस्वार्थ और निस्वार्थ से परमार्थ की ओर आगे बढऩे का प्रयास करना है। 18 पाप स्थानकों में प्रारंभ के पांच पापों का कारण ही क्रोध, मान, माया, लोभ है।

