संसार में सुख खोजने के स्थान पर अपने अंदर सुख खोजने का प्रयास करें – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि इस चातुर्मास काल में हमे परमात्मा से अर्थात परमात्मा के ज्ञान से जुडऩे का प्रयास है। वास्तव में परमात्मा का ज्ञान ही परमात्मा है। परमात्मा के ज्ञान को हम जितना जानते जाएंगे परमात्मा से उतना ही जुड़ते जाएंगे। परमात्मा के ज्ञान को समझने के बाद परमात्मा को पाने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ेगा। जो जीव जितना सम्यक पुरुषार्थ करेगा वह परमात्मा का उतना ज्ञान प्राप्त कर सकता है। और ज्ञान प्राप्त करके अनंतकाल तक सुख प्राप्त कर सकते है। संसार का प्रत्येक जीव सुख पाना चाहता है। परमात्मा कहते है सुख प्राप्त करने के चार शर्त है। पहला संपूर्ण सुख हम संसार में ऐसा सुख पाना चाहते है जिसमें कहीं भी कोई भी दुख न आए। अर्थात जहां केवल सुख ही सुख हो। कहीं दुख का नाम भी न हो। दूसरा सतत सुख प्राप्त होने वाला सुख लगातार चलते रहे। निरंतर सुख की प्राप्ति होनी चाहिए। कभी ये समाप्त न हो। तीसरा सर्वोत्तम सुख सर्वोत्तम सुख अर्थात सबसे अच्छा सुख। अर्थात हमें जो सुख मिल रहा है वो सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। चौथा स्वाधीन सुख ऐसा सुख जिसे कोई और छीन न सके। अर्थात ऐसा सुख जिसे चाह कर भी कोई दूसरा ले न सके। परमात्मा कहते है हमें इन चार प्रकार के सुख को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। किंतु ऐसे सुख को प्राप्त करने के लिए हम प्रयास ही नहीं करते है। संसार में जीव आतुर है अर्थात अशांत, दुखी, आकुल व्याकुल है। वो दूसरों को भी यही सब दे सकता है। इसलिए संसार में सुख खोजने के स्थान पर अपने अंदर सुख खोजने का प्रयास करना चाहिए।