धर्मनगरी धमतरी में चातुर्मासिक धर्मसभा में भगवान महावीर के जन्म एवं च्यवन कल्याणक का भावपूर्ण वर्णन
परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने जिनवाणी के माध्यम से श्रद्धालुओं को कराया जैन दर्शन के अद्भुत प्रसंगों से परिचित

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में धर्मसभा का आयोजन किया जा रहा है। परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने अपने प्रवचन में भगवान महावीर के जन्म कल्याणक एवं च्यवन कल्याणक से जुड़े अनेक अद्भुत एवं प्रेरणादायी प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया। साथ ही जैन दर्शन में वर्णित 10 अच्छेरों के बारे में भी श्रद्धालुओं को जानकारी दी। छप्पन दिक्कुमारियों के आसन कम्पायमान होने से हुआ जन्म कल्याणक का संकेत परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने भगवान के जन्म कल्याणक का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब परमात्मा का जन्म होता है, तब सबसे पहले छप्पन दिक्कुमारियों के आसन कम्पायमान होते हैं। इससे वे समझ जाती हैं कि परमात्मा का जन्म कल्याणक होने वाला है। यह जानकर सभी दिक्कुमारियां अत्यंत प्रसन्न होती हैं और परमात्मा के जन्माभिषेक की तैयारियों में जुट जाती हैं। इसके बाद संगमदेव द्वारा सुघोषा घंटा बजाया जाता है। घंटा बजते ही सभी देव सावधान हो जाते हैं। देव अपने अवधिज्ञान के माध्यम से परमात्मा के जन्म कल्याणक का समय जानकर हर्षित होते हैं और जन्माभिषेक की तैयारियों में लग जाते हैं।
सौधर्मेंद्र ने माता से ली परमात्मा को मेरु पर्वत ले जाने की आज्ञा
प्रवचन में बताया गया कि परमात्मा की माता के पास सौधर्मेंद्र पहुंचते हैं और सर्वप्रथम माता को वंदन करते हुए कहते हैं—हे जगतपूज्यनीय, त्रैलोक्य वंदनीय माता! आप मेरा वंदन स्वीकार करें। हमें परमात्मा का अभिषेक करने के लिए उन्हें मेरु पर्वत ले जाना है। कृपया हमें इसकी आज्ञा प्रदान करें। माता से आज्ञा प्राप्त करने के बाद सौधर्मेंद्र माता को अवस्वापिनी निद्रा में सुलाकर परमात्मा को लेकर मेरु पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं। वहीं शेष 83 इंद्र भी सीधे मेरु पर्वत पहुंचते हैं। मेरु पर्वत पहुंचने के बाद इंद्र घोषणा करते हैं कि यह परम पूजनीय परमात्मा के जन्म कल्याणक का समय है। इसलिए कोई भी दुष्ट अथवा पापमय कार्य न करे और न ही कोई परमात्मा के प्रति क्रोध या बैर का भाव रखे।
एक अंगूठे के स्पर्श से कम्पायमान हुआ पूरा मेरु पर्वत
मेरु पर्वत पर सौधर्मेंद्र परमात्मा को अपनी गोद में लेकर बैठे होते हैं और अन्य सभी इंद्र उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। उसी समय सौधर्मेंद्र के मन में विचार आता है कि यह बालक बहुत छोटा है। यदि एक हजार योजन वाले कलश से अभिषेक किया गया तो कहीं परमात्मा जल के प्रवाह में बह न जाएं। परमात्मा अपने अवधिज्ञान से सौधर्मेंद्र के मन की इस भावना को जान लेते हैं। उन्हें प्रतिबोधित करने के लिए परमात्मा अपने बाएं पैर के अंगूठे से पर्वत की शिला को स्पर्श करते हैं। परमात्मा के शिला को स्पर्श करते ही पूरा मेरु पर्वत कम्पायमान हो उठता है। यह देखकर सौधर्मेंद्र आश्चर्यचकित हो जाते हैं और अवधिज्ञान से जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर ऐसा किसने किया। जब उन्हें ज्ञात होता है कि यह परमात्मा की लीला है, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है। उन्हें समझ आता है कि उन्होंने परमात्मा के छोटे से शरीर को तो देखा, लेकिन उनकी अनंत एवं अपार शक्ति को पहचान नहीं पाया। सौधर्मेंद्र अपनी भूल के लिए परमात्मा से क्षमा याचना करते हैं और सभी इंद्रों को अभिषेक करने की आज्ञा प्रदान करते हैं। इसके बाद सभी इंद्र अत्यंत हर्षोल्लास एवं भक्तिभाव के साथ परमात्मा का जन्माभिषेक संपन्न करते हैं। अभिषेक के पश्चात परमात्मा को पुन: उनकी माता के पास स्थापित किया जाता है और सभी देव अपने-अपने देवलोक की ओर प्रस्थान करते हैं।
परमात्मा का च्यवन कल्याणक भी है अत्यंत महत्वपूर्ण
प्रवचन के दूसरे प्रसंग में परमात्मा के च्यवन कल्याणक का वर्णन करते हुए महाराज साहेब ने बताया कि इंद्र अपने अवधिज्ञान से जानते हैं कि तीर्थंकर परमात्मा का जन्म निम्न कुल में नहीं होता। जब परमात्मा का आगमन देवानंदा की कुक्षी में होता है, तब इंद्र विचार करते हैं कि परमात्मा को श्रेष्ठ कुल में स्थापित करना उनका कर्तव्य है। इसी विचार के साथ इंद्र हरिणगमेषी देव को बुलाकर आदेश देते हैं कि भरत क्षेत्र में जाकर परमात्मा के गर्भ का देवानंदा माता की कुक्षी से गर्भापहरण कर उसे त्रिशला माता की कुक्षी में स्थानांतरित किया जाए। हरिणगमेषी देव इंद्र की आज्ञा का पालन करते हुए देवानंदा माता के पास पहुंचते हैं और गर्भ को त्रिशला माता की कुक्षी में स्थानांतरित करते हैं। इसके बाद इंद्र को अपनी आज्ञा पूर्ण होने की सूचना देते हैं। इस पवित्र घटना को ही परमात्मा का च्यवन कल्याणक कहा जाता है।