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अमेरिका, आस्ट्रेलिया,कनाडा के साथ ही देश विदेश में भी है 800 साल प्राचीन मकेश्वर महादेव के भक्त

आस्था,श्रद्धा और विश्वास से भरा है भक्तिमय इतिहास,मंदिर से जुड़ी है अनेक मान्यताएं,सौ साल तक एकांतवासी रहे भोले भंडारी

वर्ष भर सोमवार शाम को भक्तों के लिए रहता है भण्डारा प्रसादी

धमतरी. प्राचीन मकेश्वर महादेव का मंदिर जो कि शहर के हृदय स्थल मकई चौक में स्थित है जिसका उपलब्ध तथ्यों तथा प्रमाणित साक्ष्यों के अनुसार अपना लगभग 800 साल पुराना आस्था और श्रद्धा से भरा हुआ पौराणिक गौरवशाली इतिहास है। बताया जाता है कि कभी बस्तर की ओर जाने-आने वाली मालवाहक बड़ी गाडिय़ों को तत्कालीन समय में अनेक प्रकार की परेशानियों के साथ अनहोनी घटनाओं का सामना इसी स्थल पर करना पड़ता था जिसमें तंत्र मंत्र जादू टोना भूत प्रेत , जंगली जानवर शामिल थे।तब उस समय यहां घनघोर जंगल तथा विशाल तालाब होने से सन्नाटा पसरा रहता था जंगली जानवरों के साथ-साथ जहरीले जीव जंतु भी यहां पर रहते थे तब रात में गाडिय़ों का ठहराव और रूकना विश्राम के साथ भोजन भी पकाना भी इसी स्थल पर होता था, उस समय किसी ने यहां पर स्थित एक पेड़ के नीचे शिवलिंग के आकार के पत्थर पर काले नाग को लिपटा हुआ देखकर तालाब में स्नान करते हुए सर झुकाकर पूजा अर्चना कर जब बस्तर की और आगे बढ़े तो उन्हें व्यापार व्यवसाय में काफी प्रगति हुई और वह यहां पर आकर एक चबूतरा बनाकर अन्य कई लोगों को आस्था और श्रद्धा के साथ पूजा करने के लिए प्रेरित किया तब से लेकर आज तक प्राचीन मकेश्वर महादेव में पूरे विश्वास के साथ आने वाले भक्तों की हर मनोकामना की पूर्ति होती है और इसी के नाम पर शहर का हृदय स्थल मकई चौक के नाम से जाना जाना लगा तथा वर्तमान समय में तालाब के चारों ओर बसा हुआ वार्ड मकेश्वर वार्ड भी कहलने लगा। बताया जाता है कि भगवान भोले भंडारी अपरिहार्य कारणों से लगभग 100 वर्ष तक एकांतवासी रहे और जो लोग उन्हें एकांत में रखने का कारण बने आज उनकी स्थिति बहुत खराब है और बाद में भक्तों के अथक प्रयास से बाबा भोलेनाथ अपने दिव्य एवं भव्य रूप में शक्ति के स्रोत बनाकर भक्तों को दर्शन दिए तब से लेकर आज तक प्रतिदिन मंदिर में लोगों का दर्शन एवं पूजा अर्चना हेतु तांता लगा रहता है ।प्रति सोमवार को यहां होने वाले भंडारे में काफी संख्या में लोग पहुंचते हैं मान्यताओं में तो यह भी शामिल है कि यहां लगा हुआ विशालकाय घंटा जिसमें अंकित हिजरी सन् की अवधि से लगभग 200 वर्ष पुराना बताया जाता है जिसे काशी विश्वनाथ से बैलगाड़ी की सवारी कर धमतरी तक लाया गया था उसे बजाने पर आज भी ऊँ नम: शिवाय की प्रतिध्वनि निकलती है वहीं अनेक अवसरों पर गाहे-बगाहे काले नाग जो की मंदिर के दरवाजे के चौखट तक अपनी आमद देते हैं इसलिए अनेक भक्त चौखट पर अपना माथा रखकर दिल से जो बात बाबा भोलेनाथ के सामने रखते हैं वह निश्चित ही पूरी हो जाती है, बहरहाल प्रतिदिन शाम के समय अद्भुत ,अलौकिक अद्तिय श्रृंगार होने वाले भगवान भोले भंडारी का विशेष पूजा अर्चना सामान के समय आकर्षण का केंद्र रहेगा जहां प्रति सोमवार को फलाहारी भंडारे की भी व्यवस्था रहेगी जिसकी तैयारी के लिए बाबा के भक्त अभी से जुटे हुए हैं।

Ashish Kumar Jain

Editor In Chief Sankalp Bharat News

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