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जिनवाणी के माध्यम से देव, गुरु, धर्म से जुडऩा है – प्रशम सागर जी म.सा.


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज से चातुर्मासिक प्रवचन प्रारंभ हो रहा है। हमें जिनवाणी के माध्यम से देव, गुरु, धर्म से जुडऩा है। ज्ञानीभगवंत कहते है हमे धर्म करके मोक्ष पद को प्राप्त करना है। इसका साधन है देव, गुरु, धर्म। धर्म का पहला चरण होता है विनय। धर्म का प्रारंभ विनय गुण से होता है और इसके परिणाम स्वरूप मोक्ष की प्राप्ति होती है। जैसे एक घर चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। किंतु उसका प्रवेश द्वार छोटा होता है। अर्थात उस घर में प्रवेश करने के लिए झुकना पड़ता है। उसी प्रकार मोक्ष रूपी घर को प्राप्त करने के लिए विनय के साथ झुकना पड़ता है। और झुकने वाला प्रवेश कर लेता है। विनय पूर्वक हमने जो प्राप्त किया है उसे आत्मसात करना दूसरा क्रम है। बिना गुरु के सम्यकदर्शन नहीं हो सकता। आज हमें ऐसे गुरु के उपकरो को याद करना है जिनकी कृपा से जिनशासन हम तक सुरक्षित पहुंच पाया। आज पहले दादा श्री जिनदत्त सुरी जी महाराज साहेब की 871वीं स्वर्गारोहण जयंती है। दादा गुरुदेव की अनेक दादाबाड़ी पूरे देश में है। हमें दादा गुरु के जीवन को दो प्रकार से समझना चाहिए। दादा गुरुदेव के पास अनेक लब्धिया थी। गुरुदेव ने प्रतिक्रमण के समय 64 जोगनिया जो परीक्षा लेने आई थी उन्हें स्तंभित कर दिया। जोगनिया को आपने जिनशासन की महिमा बताते हुए पुन: मुक्त किया। जाते समय जोगनियों द्वारा गुरुदेव को 7 वरदान दिया गया। आपके द्वारा राजस्थान के विक्रमपुर नगर में फैली हुई महामारी को सप्तस्मरण का पाठ कराकर दूर किया और जिनशासन की महान प्रभावना की । साथ ही 1 लाख 30 हजार अजैनो को जैनधर्म से जोडऩे का कार्य किया। साथ ही 500 श्रावक और 700 श्राविकाओं को संयम दिया अर्थात् वे साधु साध्वी बने।

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