दुर्लभ मानव जीवन प्रमाद के लिए नहीं बल्कि आत्मा के विकास के लिए मिला है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म. सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आजतक हम संसार को बढ़ाने वाले ज्ञान को पढ़ते आए है जिससे आत्मा का कोई संबंध नहीं है। अब हमें उस ज्ञान को उस विषय को पढऩा है जिसका संबंध आत्मा से है जिससे आत्मा का विकास हो सकता है। उत्तराध्यान सूत्र का चौथा अध्याय है असंस्करित। इसका अर्थ है जिसे जोड़ा या बदला न जा सके। इसके विपरीत संस्करित अर्थात जिसे जोड़ा जा सके या बदला जा सके। किसी भी जीव का जीवन असंस्करित है। क्योंकि एक दिन इस शरीर का इसका अंत जरूर होगा। शरीर का अंत होने पर दुख नहीं महोत्सव मनाया जाए। हमें इस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए। ज्ञानी कहते है यह जीवन क्षणभंगुर है इसलिए क्षणभर भी प्रमाद अर्थात आलस्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि प्रमाद करने वाले का जीवन व्यर्थ हो जाता है। यह दुर्लभ मानव जीवन प्रमाद के लिए नहीं बल्कि आत्मा के विकास के प्रति जागरूक होने के लिए मिला है। जागरूक रहने वाला जीव ही जीवन को जीवंत बना सकता है। अगर कोई आंख बंद करके सोता है तो संसार की दृष्टि से कुछ जन-धन की हानि हो सकती है। लेकिन ज्ञानीं कहते हैं जो खुली आंख से सोता है अर्थात जिसकी आंख खुली होती है लेकिन अज्ञानता या मिथ्यात्व के अंधकार में सोते रहता है उसके आत्मा का विकास रुक जाता है।