Uncategorized

कितने भव के बाद मानव भव और दुर्लभ जिनशासन मिला है अब इसे व्यर्थ नहीं जाने देना है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि
हे चेतन हमे अपने प्रभु में ही रम जाना है तभी आत्मा का उद्धार हो सकता है। अब तक हम चारों गति में भटकते रहे इसीलिए संसार के अटके रहे। क्योंकि जीव अब तक धर्म को समझ नहीं पाया था। अब निज धर्म अर्थात आत्मा के धर्म को समझना है। और उसके लिए परमात्मा का आलंबन लेना है। अब मेरा भाग्य जगा है क्योंकि सच्चे देव मिले है जिनवाणी रूपी माता मिल है जिनके कारण मेरे नेत्र खुल गए है। बड़ी मुश्किल से न जाने कितने भव के बाद मानव भव और दुर्लभ जिनशासन मिला है। अब इसे व्यर्थ नहीं जाने देना है। अब आत्मा के प्रति राग प्राप्त करना है क्योंकि यही मेरा अपना है। मेरा अर्थात मेरी आत्मा का सपना भगवान बनने का था। अब उसे पाने का पुरुषार्थ करना है। अब प्रभु को पाकर खोना नहीं है। मै भी सिद्ध भगवान के साथ उनके जैसा ही हर्ष और आनंद के साथ रहूंगा। मुझे भी कोई पीड़ा नहीं होगी। अब मानव जन्म के रूप में अवसर आया है हमे प्रभु की मानना है। भेद ज्ञान अर्थात शरीर और आत्मा का भेद ज्ञान प्राप्त करना है ताकि इसके बाद और जन्ममरण न करना पड़े अर्थात संसार भ्रमण से मुक्ति मिल जाए। ज्ञानी कहते है हम संसार के कार्यों के लिए हमेशा चिंता करते है। भूख न लगे या भूख लगे और भोजन न मिले तो चिंता खाने की होती है। लेकिन क्या कभी ये चिंतन हुआ कि किसी जन्म में मैने किसी को भोजन से दूर किया हो जिसका अभी उदय हो रहा है। चिंता करते हुए जो आत्म चिंतन तक पहुंच जाता है उसका चित्त अर्थात मन परमात्मा बनने की ओर अग्रसर हो जाता है।

Ashish Kumar Jain

Editor In Chief Sankalp Bharat News

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!