जीवन में जितनी भी अशांति है उसका कारण ही पाप है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि कुछ पल की जिंदगी है इसमें केवल आगे बढऩे का प्रयास करना है। एक दिन सभी को इस संसार से जाना है, एक पल का भी ठिकाना नहीं है। मर मर कर हम अपने तन को सुंदर बनाने का प्रयास करते है। इत्र की खुशबू से शरीर को महकाते है। लेकिन एक दिन शरीर का अंत जरूर होगा। तो फिर इसे क्यों इतना सजा रहे पता नहीं। ऐसी भी घड़ी जीवन में आएगी जब कोई साथ नहीं होगा। एक एक कर्मों का हिसाब यहीं होगा। यही सोचकर हमको कर्म करना चाहिए। इस संसार में कोई मेरा नहीं है। फिर मेरा मेरा क्यों करते है समझ से परे है। खाली हाथ ही इस संसार में आए थे और खाली हाथ ही यहां से जाना है। इसलिए अब अपने अंदर की आंखों को खोलने का प्रयास करना है ताकि आत्मविकास का एक नया सबेरा हो सके। चातुर्मासकाल अपनी गति से चल रहा है। और हम सब अपनी योग्यतानुसार जिनवाणी को सुनकर, मानकर उसी तरह जीने का प्रयास कर रहे है। अगर वास्तव में भगवान की तरह हम भी जीवन जी पाए तो भगवान की तरह सुख भी प्राप्त कर लेंगे। परमात्मा 18 पाप स्थानकों को समझाते हुए कहते है। हम जीवन भर पाप करते रहते है। हम कोई ऐसा काम नहीं करते जिसमें पाप न हो। जीवन में जितना पाप कर रहे है उतना ही जीवन का नाश होते जा रहा है। जीवन में जितनी भी अशांति है उसका कारण ही पाप है। संसार में जीवन को चलाने का साधन पाप को मानते है जबकि परमात्मा कहते है बिना पाप के भी जीवन चल सकता है। पाप जीवन को डुबाने का काम करता है। पाप के बिना अगर जीवन व्यतीत करे तो जीवन का विकास हो सकता है। जिस प्रकार एक बच्चा अपने कपड़ों को खेलते खेलते जल्दी गंदा कर लेता है। लेकिन मां सभी कार्य करते हुए भी अपने कपड़ों को गंदा होने से बचा लेती है। उस मां के समान ही हमे भी संसार के कार्यों को करते हुए अपने कपड़े रूपी आत्मा को गंदा होने से अर्थात पाप कार्यों से बचाना है। ज्ञानी कहते है अपनी आत्मा को न पहचानना ही अपने आप से द्वेष है। द्वेष ही आत्मा की दुर्गति का कारण है। आत्मा की जागृति के लिए शरीर का राग छोडऩा पड़ेगा।
