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जीवन में सकारात्मक सोच ही हमे कषाय के पाप से बचा सकता है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आत्मा के आनंद की अद्भुत महिमा है। जिसमें आत्मा को देखने का प्रयास किया उसमें आत्मसुख का अनुभव प्राप्त किया। आत्मा की प्रभुता हमे पावन और पवित्र बना देता है। किंतु पुण्य के प्रताप से ही आत्मा को देख सकते है। आत्मा के चिंतन की अद्भुत महिमा है ।जन्ममरण से मुक्त होने के लिए आत्मा का चिंतन करते हुए उचित पुरुषार्थ करना चाहिए। आत्मा का चिंतन करने वाला संसार से जाकर भी संसार में अजर अमर हो जाता है। आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाला संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है। अत: हमे भी संसार से मुक्त होने के लिए आत्मा का भेद जानकार अपने अंदर के ज्ञान को प्रकट करना है। चेतन अर्थात आत्मा अदभुत है क्योंकि चेतन के जागृत होने पर संसार की किसी भी वस्तु का मोह समाप्त हो जाता है। किंतु संसारी जीव शरीर को महिमा देखता है जबकि ज्ञानी आत्मा अर्थात चेतन की महिमा देखते है। अब हमें आत्मा की महिमा को सुनना है, देखना है और समझना है। समझकर वैसा ही जीने का प्रयास करना है। तभी जीवन सार्थक होगा। ज्ञानी कहते है हम पुण्य का फल आज चाहते है लेकिन पाप का फल आज नहीं चाहते। सभी पुण्य चाहते है लेकिन पुण्य के लिए कार्य कोई नहीं करना चाहते। जबकि पाप कोई नहीं चाहता लेकिन कर्म पाप के ही करते है। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता के माध्यम से यही बताया है कि हे जीव तू कर्म कर फल की चिंता मत कर। किंतु वैसा कर जैसा तू फल चाहता है। 18 पाप स्थानकों में हम कषाय को समझने का प्रयास करते है। ज्ञानियों का कहना है कि कषाय ही हमारे शरीर और आत्मा दोनों को दुखी करता है। कषाय महाभयानक होता है। हमें लगता है कषाय करने से काम होगा। जबकि कषाय हमारा काम-तमाम कर देता है। पाप का मूल ही कषाय है। कषाय ही दुख का कारण है। जीवन में मान कषाय क्रोध को जन्म देता है। क्रोध के कारण हम पाप करते है। जीवन में कषाय करके अर्थात अपना नुकसान करके किसी को सुधारना मूर्खता है। मिलने वाली परिस्थिति में भी जीवन में आनंद और शांति बढ़े। ऐसा विचार ही सकारात्मक विचार होगा। क्रोध कषाय से बचने के लिए सकारात्मक विचार होना आवश्यक है। जीवन में सकारात्मक सोच ही हमे कषाय के पाप से बचा सकता है।

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