पेसा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन से आदिवासी समाज मे रुकेका धर्मान्तरण- डॉ संजीव

प्रोफेसर (डॉ.) संजीव वशिष्ठ, प्रान्त अध्यक्ष सर्व समाज समन्वय महासभा, छत्तीसगढ़ द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि पेसा अधिनियम के अंतर्गत ग्राम सभा को प्रदत्त संवैधानिक अधिकार, आदिवासी क्षेत्रों में अनैच्छिक एवं अनुचित धर्मांतरण को रोकने हेतु सर्वाधिक प्रभावी एवं विधिसम्मत माध्यम सिद्ध हो रहे हैं।उन्होंने बताया कि ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जो व्यक्ति आदिवासी रूढ़ि-परंपराओं, सामाजिक व्यवस्था एवं सांस्कृतिक परंपराओं से स्वयं को पृथक कर किसी अन्य धर्म को स्वीकार करता है, वह अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक श्रेणी में सम्मिलित नहीं रहेगा।कांकेर जिले में घटित घटनाक्रम के पश्चात्, लगभग 90 ग्रामों में आयोजित बैठकों के माध्यम से ग्राम प्रमुखों, सामाजिक प्रतिनिधियों एवं जनप्रतिनिधियों को इस विषय में विधिक एवं संवैधानिक प्रावधानों से अवगत कराया गया। उसी समय यह स्पष्ट किया गया था कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया का निर्णय पेसा अधिनियम की मूल भावना एवं ग्राम स्वशासन के अधिकारों के संरक्षण के पक्ष में ही आएगा।माननीय सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम निर्णय के उपरांत यह विधिक रूप से स्थापित हो गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों के नियंत्रण एवं विनियमन का अधिकार प्राप्त है। इसके अंतर्गत अब ग्राम पंचायत एवं ग्राम सभा द्वारा सूचना-पट्ट (सूचना बोर्ड) स्थापित कर बाहरी धार्मिक प्रचार एवं अनधिकृत गतिविधियों पर विधिसम्मत निगरानी रखी जा सकेगी।कांकेर प्रकरण के पश्चात्, ईश्वर कावड़े की प्रेरणा से सर्व समाज द्वारा आहूत छत्तीसगढ़ बंद एवं निरंतर सामाजिक प्रयासों के परिणामस्वरूप, सर्व समाज समन्वय महासभा के पदाधिकारियों—प्रान्त संरक्षक शिशुपाल सोढ़ी , प्रान्त निदेशक रामाशंकर श्रीवास्तव , जिला संयोजक ईश्वर कावड़े तथा स्थानीय आदिवासी समाज एवं कार्यकर्ताओं के समन्वित सहयोग से अब तक 400 से अधिक आदिवासियों की विधिपूर्ण एवं सामाजिक परंपराओं के अनुरूप घर वापसी (रूढ़ि परंपरा में पुनः समावेशन) कराई गई है।
इस सदर्भ में धमतरी जिले के कार्यकर्ताओं दिलीप पटेल , श्रीमती पद्मिनी चंद्राकर श्रीमती विमला पटेल तथा विजय पदमवार द्वारा कांकेर जिला प्रवास के दौरान किए गए अथक प्रयास अत्यंत सराहनीय रहे हैं। साथ ही, सर्व समाज के समस्त कार्यकर्ताओं का इस अभियान में विशेष योगदान रहा है।प्रोफेसर (डॉ.) संजीव वशिष्ठ ने सभी सामाजिक संगठनों, ग्राम प्रतिनिधियों एवं कार्यकर्ताओं से आह्वान किया है कि वे भविष्य में भी संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप सतर्कता, समन्वय एवं विधिक मर्यादाओं के अंतर्गत कार्य करते हुए आदिवासी समाज की सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक पहचान की रक्षा हेतु निरंतर सक्रिय रहें।यह निर्णय आदिवासी स्वशासन, सामाजिक समरसता एवं संवैधानिक मूल्यों की सुदृढ़ता की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ है।
