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तपस्या का घमंड, दान का अहंकार, ज्ञान का अभिमान ये सब मन के ही जाल हैं बड़े-बड़े गुणी भी इससे बच नहीं पाए

स्वामी टेऊँराम जी महाराज के चालीहा महापर्व के 14 वें दिन चालीसा पाठ सत्संग एवं भंडारे का आयोजन

अपने मन को वश में करने का मार्ग बताने एवं प्रेरणा देने वाले आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के जारी उमंग से भरे चालीहा महापर्व के 14 वें दिन दिन के चालीसा पाठ सत्संग एवं भंडारे का आयोजन रोहरा परिवार के बालचंद रोहरा एवं उनके पुत्रों अशोक नरेन्द्र अनिल दिनेश संतोष राजेश एवं पौत्रों साकेत संदीप अतुल रवि अक्षय अजय एवं नमन रोहरा ने कराया जिसमें बड़ी संख्या में बरसात के मौसम का आनन्द उठाते हुए सम्मिलित हो सत्संग का लाभ ले प्रसादी ग्रहण की
आज के सत्संग में संत जी ने मन को बलवान बताते हुए बताया कि कैसे मन ने सारे संसार पर विजय प्राप्त की है.आचार्य श्री ने हमें समझाया है हमारा मन ही राजा बनकर बैठा है। अपनी जिद, लालच, क्रोध के बल से इसने पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चलाना शुरू कर दिया है। हमारा मैं ही सब कुछ कंट्रोल कर रहा है।रावण, कुम्भकर्ण, बाली, हिरण्यकश्यप – ये सब ताकत में सबसे आगे थे। पर मन के वश में आकर अहंकार, निद्रा, लोभ में फंस गए और नष्ट हो गए। मतलब ताकतवर होना काफी नहीं, अगर मन काबू में नहीं है तो विनाश तय है तप करने वाले, दान करने वाले, धर्म निभाने वाले, वेद पढ़ने वाले विद्वान मन ने इन सबको भी गिरा दिया। तपस्या का घमंड, दान का अहंकार, ज्ञान का अभिमान ये सब मन के ही जाल हैं। बड़े-बड़े गुणी भी इससे बच नहीं पाए।
इसीलिए स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने आगाह करते हुए कहा हैं कि मन सबको डराता है। मृत्यु का डर, हार का डर, इज्जत जाने का डर। आज तक कोई ऐसा नहीं दिखा जो पूरी तरह निर्भय हो। जो सत्गुरु का प्यारा है वही निडर होकर रह सकता है बस एक ही रास्ता है निर्भय होने का है जो इंसान सच्चे सतगुरु से जुड़ जाता है, गुरु की शिक्षा पर चलता है, उसका मन शांत हो जाता है। गुरु की कृपा से मन का राज खत्म और आत्मा का राज शुरू इसी बात को पंचम पीठधीश्वर सद्गुरु स्वामी भगत प्रकाश जी ने भी ऐसे समझाया है कि बाहर रावण को मारने से कुछ नहीं होगा। असली रावण तो मन के अंदर है। उसे जीतने के लिए गुरु की शरण जरूरी है।

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