क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु, क्षमा सबसे बड़ा आभूषण – पूज्य रत्ननिधि श्रीजी म. सा.
धर्म को जीवन में उतारने का दिया संदेश

धमतरी। इतवारी बाजार स्थित श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में आयोजित चातुर्मास महोत्सव मे श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच विशाल धर्मसभा का आयोजन हुआ। प्रवचन में पूज्य गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपा क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह है। जब तक व्यक्ति इन आंतरिक विकारों पर विजय प्राप्त नहीं करता, तब तक वास्तविक सुख, शांति और आत्मिक आनंद की प्राप्ति संभव नहीं है। धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ, मंदिर दर्शन या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक व्यवहार को पवित्र और संस्कारवान बनाना है। गुरुदेव ने कहा कि क्रोध एक ऐसी अग्नि है, जो सबसे पहले उसी व्यक्ति को जलाती है, जिसके भीतर वह उत्पन्न होती है। क्रोध के कारण विवेक समाप्त हो जाता है, निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है और वर्षों से बने प्रेम, विश्वास तथा रिश्ते एक पल में टूट जाते हैं। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, धैर्य, संयम और विवेक का साथ कभी नहीं छोडऩा चाहिए। उन्होंने कहा कि क्षमा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल बनाने की साधना है। जो व्यक्ति दूसरों की भूलों को क्षमा करना सीख लेता है, वह स्वयं भी मानसिक तनाव, द्वेष और अशांति से मुक्त हो जाता है। क्षमा का भाव मनुष्य के भीतर करुणा, प्रेम और सहनशीलता को विकसित करता है, जिससे परिवार और समाज में सौहार्द का वातावरण बनता है। प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने कहा कि आज का मनुष्य भौतिक उपलब्धियों के पीछे तो निरंतर भाग रहा है, लेकिन आत्मिक विकास की ओर उसका ध्यान कम होता जा रहा है। धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन मन की शांति केवल धर्म, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन से ही प्राप्त होती है। प्रतिदिन कुछ समय आत्मनिरीक्षण करने वाला व्यक्ति स्वयं अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है और यही आत्मकल्याण की दिशा में पहला कदम होता है।
अपने जीवन को नशा, कुसंग, क्रोध और दिखावे से रखें दूर
गुरुदेव ने युवाओं का विशेष आह्वान करते हुए कहा कि वे अपने जीवन को नशा, कुसंग, क्रोध और दिखावे से दूर रखें। माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करें, समय का सदुपयोग करें, अच्छे संस्कार अपनाएँ तथा अपने चरित्र को इतना मजबूत बनाएँ कि समाज उन्हें आदर्श के रूप में देखे। उन्होंने कहा कि संस्कारवान युवा ही समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं। प्रवचन के अंत में पूज्य गुरुदेव ने सभी श्रद्धालुओं से क्रोध का त्याग, क्षमा का अभ्यास, संयमपूर्ण जीवन, नियमित स्वाध्याय तथा आत्मचिंतन का संकल्प लेने का आह्वान किया।