भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपनाकर ही समाज में शांति, सद्भाव और संस्कारों की स्थापना संभव है – पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

धमतरी. इतवारी बाजार स्थित पाश्र्वनाथाय जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहब आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला निरंतर जारी है। प्रेरणादायी प्रवचन में पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि महावीर भगवान का संदेश केवल किसी एक समाज या धर्म के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है। उनके द्वारा बताए गए अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अनेकांत, क्षमा, दया, करुणा और आत्मसंयम के सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने हजारों वर्ष पूर्व थे। यदि प्रत्येक व्यक्ति इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो समाज से वैमनस्य, हिंसा, तनाव और अशांति स्वत: समाप्त हो सकती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठा हुआ क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और ईष्र्या है। जब तक व्यक्ति इन विकारों पर विजय प्राप्त नहीं करता, तब तक वह वास्तविक सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकता। भगवान महावीर ने आत्मविजय को सबसे बड़ी विजय बताया है। जो स्वयं पर नियंत्रण करना सीख लेता है, वही सच्चे अर्थों में धर्म का पालन करता है।
नई पीढ़ी को धर्म, संस्कृति और संस्कारों से जोडऩा समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को मोबाइल और आधुनिकता के साथ-साथ धर्म, संस्कृति और संस्कारों से जोडऩा समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। माता-पिता अपने बच्चों को जिनवाणी, नवकार मंत्र, मंदिर, गुरु भगवंत और धार्मिक गतिविधियों से जोड़ें। संस्कारित युवा ही समाज और राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य बनते हैं। यदि युवा महावीर भगवान के आदर्शों को अपनाएंगे, तो समाज में नैतिकता, अनुशासन और सद्भाव स्वत: बढ़ेगा।
