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पुण्य के उदय से आंतरिक गुण अर्थात विनय, विवेक, अनुशासन, शील आदि सद्गुणों का विकास होता है -परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब

अध्यात्म योगी उपाध्याय प्रवर परम पूज्य महेंद्र सागर जी महाराज साहेब उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब आदि ठाना परम पूज्य निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की शिष्या परम पूज्य हंसकीर्ति श्री जी महाराज साहेब आदि ठाना श्री पार्श्वनाथ जिनालय में विराजमान है।
युवा मनीषी उपाध्याय प्रवर परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब ने आज के प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज से शाश्वत नवपद ओली की आराधना प्रारंभ हो रही है। आज नवपद ओली के प्रथम दिन अरिहंत परमात्मा की आराधना करनी है। अरिहंत अर्थात आत्मा का शुद्ध स्वरूप, अरिहंत अर्थात आत्मा की सर्वोच्च स्थिति। शरीर सहित दिख रहे परमात्मा का आलंबन देखकर आज उनकी आराधना करती है। उनके शरीर को देखकर विचार करना है ये शरीर सहित दिखाई दे रहे है लेकिन शरीर से मुक्त हो गए है। लेकिन हम अभी शरीर सहित है। प्रयास करना है कि हम भी भविष्य में शरीर से मुक्त हो । अरिहंत परमात्मा की अवस्था को प्राप्त करे। सिद्ध और बुद्ध अवस्था को प्राप्त करे। पुण्य कर्म के उदय जब बाह्य सुख मिलता है तो वह बाह्य सुख पाप बंध का कारण बन जाता है। पुण्य के उदय से आंतरिक गुण अर्थात विनय, विवेक, अनुशासन, शील आदि सद्गुणों का विकास होता है तो वह आंतरिक सुख पुण्य बंध का कारण बन जाता है। आंतरिक सुख आत्मा को शाश्वत सुख दिलाने की क्षमता रखता है। बाह्य सुख से जीवन में सम्पन्नता आ सकता है लेकिन शांति आंतरिक सुख से ही प्राप्त होता है। पुण्य के उदय से मिली हुई साधन और सुविधा पुण्यानुबंधि पाप का कारण बन जाता है। लेकिन पुण्य के उदय से मिला हुआ आंतरिक सुख ,आत्मिक सुख पुण्यानुबंधि पुण्य का कारण बन जाता है। परमात्मा के प्रति समर्पण भाव आंतरिक पुण्य के उदय से आता है। परमात्मा के प्रति अहो भाव आंतरिक सुख है। आंतरिक सुख मन की प्रसन्नता है। वास्तव में जिसे हम संसार में कीमती मानते है वह बाह्य सुख है अर्थात पाप बंध का कारण है। और जिसे हम संसार में कीमती नहीं मानते वास्तव में वही आंतरिक सुख है। और वह पुण्य बंध का कारण बनता है। हम संसार के संताप में फंसकर बाह्य सुख अर्थात संपन्नता, साधन और सुविधा आदि को ही वास्तविक सुख मान लेते है। जबकि पुण्य के उदय से मिला हुआ यह सुख और साधन हमे पाप कार्यों की ओर ले जाता है। और यह आत्मा के पतन का कारण बनता है। संसार अर्थात बाह्य सुख का मोह हमे आत्मविकास से दूर करता है। यह संसार स्वार्थी है। यहां पर सभी को केवल अपनी ही चिंता रहती है। दूसरों की चिंता केवल दिखावे के लिए होता है। वास्तव में हमे केवल इस नाशवान शरीर की चिंता रहती है जबकि शाश्वत आत्मा की कोई चिंता नहीं करते। यही हमारा स्वार्थ है। इस भव के साथ हमारा शरीर बदल जाएगा। लेकिन आत्मा यही रहेगी। फिर भी हम शरीर को सजाने, संवारने का काम करते है जबकि आत्मा को आंतरिक गुणों से सजाना भूल जाते है। यही कारण है कि ज्ञानी भगवंत संसार को स्वार्थी मानते है। स्वार्थ हमे वर्तमान में तो सुखी कर सकता है किन्तु भविष्य में दुख का ही करना बनता है। मन से कषाय का मल दूर होना और पवित्रता का आना ही आंतरिक सुख है।

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