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संतोष गुण सुख कारण है जबकि लोभ, दुख का कारण है – प.पू. प्रशम सागर जी म.सा.


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि सत्संग के माध्यम से परमात्मा की वाणी का आलंबन ले रहे है। आलंबन का तीन कारण है ।पहला सत्य को जानना दूसरा सत्य को मानना और तीसरा है सत्य को जीना। हम संसार में हर कार्य सुख प्राप्ति के लिए करते है। किंतु जब सुख हम बाहर खोजते है तो वह सुख का आभास या दुख का कारण बन जाता है। किंतु जब सुख अपने अंदर खोजते है वो वह हमारे आत्मविकास में सहायक बनता है। जीवन में हमारी अज्ञानता ही पाप का कारण है। अपनी अज्ञानता को दूर करने के लिए जिनवाणी एक श्रेष्ठ साधन है। भव समुद्र में हम अपनी अज्ञानता के कारण डूबते जा रहे है। जब जीव परमात्मा के ज्ञान से परिचित होते है तो परमात्मा के प्रति प्रीति और बढ़ती है। हम जिनके ज्ञान से प्रभावित होते है उनके प्रति बहुमान बढ़ता है और ऐसा रिश्ता बन जाता है जो कभी टूटता नहीं है। उत्तराध्ययन सूत्र का पहला अध्याय है विनय श्रुत अध्ययन। हम संसार में दूसरों से पूछते है तेरे पास क्या है? जबकि परमात्मा हमसे पूछते है तेरे साथ क्या है? मृत्यु के समय संसार की कोई भी वस्तु साथ नहीं जाती जिसके कारण आने वाला भव सुधर सके। फिर भी हम पूछते है तेरे पास क्या है। किंतु जो हमारे साथ जाने वाला है हमारा गुण, धर्म और कर्म। उसके बारे में केवल परमात्मा ही पूछते है क्योंकि उन्हें हमारे अगले भव की हमारे आत्मविकास की चिंता होती है। जीवन में हमेशा लोभ , बुढ़ापा और मृत्यु हमेशा साथ रहता है। विनय एक ऐसा गुण है जो अन्य सभी गुणों का रास्ता है। एक विनय गुण ही है जिसके माध्यम से अन्य गुण जीवन में लाया जा सकता है। गुण सुख देते है और अवगुण या दोष दुख का कारण बनता है। संतोष गुण सुख कारण है जबकि लोभ दुख का कारण है। राग और वीतराग के बीच का सेतु है अनुराग। जो राग से ऊपर उठकर अनुराग रूपी सेतु पर चलता है वही आगे चलकर वीतराग बन सकता है। जीवन में सुख बढ़े या न बड़े किन्तु आत्मा में आनंद बढऩा चाहिए। और आनंद बढऩे पर ही जीवन में आराधना बढ़ेगी। किसी साधु महात्मा को कुछ देने के बाद उसका पछतावा करना महादुर्भाग्य का कारण बनता है। जीवन के अंतिम समय में आंख बंद होते समय आंखों के सामने जो दिखाई देता है वहीं हमारा आदर्श होता है। शास्त्र कहता है विद्या विनय के बिना शोभायमान नहीं हो सकता। हमें आने वाली पीढ़ी को अच्छी सांसारिक शिक्षा के साथ गुणों की शिक्षा भी देनी चाहिए। आज हमारी भोगप्रधान जीवन शैली हो गई है इसलिए एक दूसरे पर विश्वास कम होते जा रहा है। जबकि योगप्रधान जीवन में विश्वास अधिक होता था।

Ashish Kumar Jain

Editor In Chief Sankalp Bharat News

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