28 साल का सफर: जिला बनने के बाद भी विकास की दौड़ में पीछे छूटा धमतरी
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में नहीं हो पाई अपेक्षित प्रगति
6 जुलाई 1998 को तत्कालीन रायपुर जिले से अलग कर धमतरी को बनाया गया था स्वतंत्र जिला


धमतरी। आज धमतरी जिले के गठन के 28 वर्ष पूर्ण हो गए। 6 जुलाई 1998 को तत्कालीन रायपुर जिले से अलग कर धमतरी को स्वतंत्र जिला बनाया गया था। जिले के गठन का उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा के साथ-साथ क्षेत्र के सर्वांगीण विकास को गति देना था।
करीब तीन दशक बीत जाने के बाद भी धमतरी आज शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, औद्योगिक विकास और आधारभूत सुविधाओं जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपेक्षित उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाया है। जिले के नागरिकों का मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों, कृषि क्षमता और पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद विकास की रफ्तार उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। हालांकि, इन 28 वर्षों में जिले में सड़क, सिंचाई, पेयजल, कृषि और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कई सकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं। महानदी के उद्गम स्थल सिहावा, गंगरेल जलाशय तथा प्राकृतिक पर्यटन स्थलों के कारण धमतरी ने अपनी अलग पहचान बनाई है। हाल के वर्षों में कृषि नवाचार और कार्बन फार्मिंग जैसी नई पहलों की भी शुरुआत हुई है। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद धमतरी ने विकास की रफ्तार पकड़ी, लेकिन रफ्तार अन्य जिलों की तुलना में धीमी ही रही।
डाक्टरों की कमी से शासकीय स्वास्थ्य सुविधाओं की बिगड़ी सेहत
स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो जिला अस्पताल सहित सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों तथा स्वास्थ्य कर्मियों की कमी लंबे समय से बनी हुई है। मरीजों को बेहतर इलाज के लिए रायपुर का रुख करना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त लागत उठानी पड़ती है। वहीं बीते 28 वर्षो में जिले में प्राईवेट हेल्थ सेक्टर काफी तेजी आई है कई निजी अस्पताल खुले जहां मरीजों को बेहतर उपचार की सुविधा मुहैय्या कराई जा रही है। वहीं शासकीय सेंटरो में भी स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास हुआ है, लेकिन डाक्टरों की कमी अभी भी खल रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में नहीं हो पाया अपेक्षित ग्रोथ
शिक्षा के क्षेत्र में भी जिले को अभी लंबा सफर तय करना है। उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के सीमित अवसरों के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को रायपुर, दुर्ग, भिलाई और अन्य शहरों में जाना पड़ता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षण संस्थानों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है। बीते 28 वर्षो में जिले में कई अवसर पर मेडिकल इंजीनियरिंग व रोजगार परख कोर्स शुरु करने की मांग हुई, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। शिक्षण सुविधाओं के मामले में जिले की स्थिति ठीक नहीं मानी जाती है।
सीमित रोजगार के अवसर
रोजगार के मोर्चे पर भी स्थिति संतोषजनक नहीं मानी जाती। जिले में बड़े उद्योगों का अभाव होने के कारण युवाओं को रोजगार के लिए अन्य जिलों और राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और लघु-मध्यम उद्यमों के विस्तार की मांग लंबे समय से उठती रही है। जिला कृषि प्रधान है यहां जल जंगल जमीन पर्याप्त है। फिर भी आज तक बड़े उद्योगों की स्थापना नहीं हो पाई। उद्योग के नाम पर जिले में सिर्फ राईस मिल है। पहले टिम्बर व्यवसाय भी जिले की पहचान हुआ करती थी, वहीं भी अब काफी सीमित हो चुका है। वनो का व्यापार भी बढऩे के बजाये घटता जा रहा है।
बायपास की मिली सौगात बड़ी रेल की बारी
दशको से धमतरी वासी बायपास व बड़ी रेल लाईन की मांग करते रहे। आखिरकार धमतरी को बायपास की सौगात मिल चुकी है। जिससे शहर के भीतर पानी वाहनों का दवाब कम हुआ है। वहीं अब धमतरी से रायपुर तक बड़ी रेल लाईन का इंतजार भी खत्म होने वाला अलगे कुछ महीनों में ही लोगो को बड़ी रेल लाईन की सौगात मिल पायेगी।
पर्यटन में है अपार संभावनाएं
धमतरी जिले को प्रकृति ने संसाधनों से सम्पन्न किया है। यहां पर्यटन की अपार संभावनाएं है। यहां की सिंचाई व पर्यटन व्यवस्था को मजबूत करने में गंगरेल (रविशंकर सागर) बांध, माडमसिल्ली, सोंढूर और दूधावा परियोजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन परियोजनाओं से कृषि को बढ़ावा मिला और पेयजल व औद्योगिक जलापूर्ति भी सुदृढ़ हुई। साथ ही पर्यटन के क्षेत्रे में भी विकास हुआ, लेकिन अब तक सिर्फ गंगरेल बांध में पर्यटन को बढ़ावा मिल पाया है। शेष बांधो में पर्यटन को बढ़ावा नही मिल पाया है। अब कलेक्टर अबिनाश मिश्रा जिले के धार्मिक व पर्यटन स्थलो कों विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे है। जिसमें रामवनगमन क्षेत्र, रुद्रेश्वर घाट कॉरिडोर, नगरी सिहावा क्षेत्र के कई पौराणिक स्थल शामिल है।

