वर्षा से किसानों के चेहरे खिले, कृषि कार्यों में आएगी गति
लगातार तेज धूप और वर्षा नहीं होने से खेती-किसानी का काम होने लगा था प्रभावित

धमतरी। जिले में 5 जुलाई को अच्छी वर्षा होने के बाद से मानसूनी गतिविधि लगभग थम सी गई थी लगातार तेज धूप और वर्षा नहीं होने से खेती-किसानी का काम प्रभावित होने लगा था। खेतों में नमी तेजी से कम हो रही थी, जिससे धान की बोआई और रोपाई की रफ्तार धीमी पड़ गई है। किसान अब एक बार फिर मानसून के सक्रिय होने का इंतजार कर रहे थे। इसी बीच बीती रात्रि से वर्षा शुरु हुई जो आज सुबह भी रुक-रुक कर वर्षा होती रही। जिससे किसानी कार्य में गति आएगी।
मिली जानकारी के अनुसार जिले में शुक्रवार देर रात से लगातार हो रही बारिश ने किसानों को बड़ी राहत दी है। लंबे समय से अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे किसानों के लिए यह वर्षा किसी वरदान से कम नहीं है। बारिश के चलते खेतों में पर्याप्त नमी आ गई है, जिससे कृषि कार्यों में तेजी देखने को मिल रही है। सूखे के कारण खेतों में पड़ गई गहरी दरारें भी अब भरने लगी हैं और किसानों के चेहरों पर फिर से उम्मीद की मुस्कान लौट आई है। बारिश नहीं होने से किसान धान की बुआई और रोपाई को लेकर चिंतित थे। कई क्षेत्रों में खेत सूखे पड़े थे और फसल प्रभावित होने की आशंका बढ़ रही थी। अब हुई वर्षा से खेतों में पानी भर गया है, जिससे किसान पूरे उत्साह के साथ बुआई, रोपाई और अन्य कृषि कार्यों में जुट गए हैं। जिन किसानों ने पहले ही बुआई कर दी थी, उन्हें भी इस बारिश से फसल के बेहतर अंकुरण की उम्मीद है। किसानों का कहना है कि यदि आगामी दिनों में भी संतुलित वर्षा होती रही तो इस वर्ष धान की अच्छी पैदावार होने की संभावना है।
अल-नीनो की संभावित स्थिति को लेकर जारी की थी विशेष एडवाइजरी
मौसम विज्ञान विभाग द्वारा अल-नीनो के प्रभाव के कारण छत्तीसगढ़ में अनियमित वर्षा एवं सूखे जैसी परिस्थितियों की संभावना व्यक्त किए जाने के बाद किसानों के लिए विशेष कृषि सलाह जारी की गई थी। एडवाइजरी में किसानों को कम एवं मध्यम अवधि में पकने वाली फसल किस्मों को अपनाने, धान की रोपा पद्धति के बजाय सीधी बुवाई (डीएसआर) को प्राथमिकता देने तथा खेतों में मेड़बंदी कर वर्षा जल संरक्षण सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालय के अनुसार डीएसआर तकनीक से लगभग 20 प्रतिशत पानी की बचत होती है तथा उत्पादन लागत भी कम होती है। उच्च भूमि क्षेत्रों में धान के स्थान पर अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, तिल, रामतिल एवं सोयाबीन जैसी दलहनी एवं तिलहनी फसलों की खेती करने की अनुशंसा की गई है। किसानों को कतार पद्धति से बुवाई, बीजोपचार, समय पर खरपतवार नियंत्रण तथा मल्चिंग तकनीक अपनाने की सलाह भी दी गई है।
