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कर्मों की शुद्धता, अहिंसा और संयम से आत्मा का होता है कल्याण : साध्वी रत्ननिधि श्री जी

चातुर्मास मे धर्मनगरी धमतरी के श्री पार्श्वनाथ जिनालय में हुआ प्रेरणादायी प्रवचन

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निरंतर जारी है। प्रवचन में साध्वी रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कर्म, अहिंसा, संयम, क्षमा और आत्मचिंतन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को जीवन को धर्ममय बनाने की प्रेरणा दी।
साध्वी जी ने कहा कि मनुष्य के जीवन में कर्मों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कार्य हमारे जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए, जिसके कारण किसी दूसरे जीव या व्यक्ति को कष्ट पहुंचे। धर्म हमें अपने कर्मों के प्रति सजग रहने और अपने आचरण को निरंतर सुधारने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर अपने जीवन में सुख-दुख का कारण दूसरों को मान लेता है, लेकिन धर्म का मार्ग हमें अपने भीतर झांकना सिखाता है। जीवन को बदलने की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। यदि मनुष्य अपने विचारों को बदल ले तो उसकी वाणी और व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगता है।
अहिंसा केवल व्यवहार नहीं, जीवन की भावना है
अहिंसा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए साध्वी जी ने कहा कि अहिंसा केवल किसी जीव को शारीरिक कष्ट नहीं देने का नाम नहीं है। मन में किसी के प्रति द्वेष रखना, वाणी से किसी को अपमानित करना या अपने व्यवहार से किसी को दुख पहुंचाना भी अहिंसा के भाव के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि हमारी वाणी हमारे व्यक्तित्व का परिचय देती है। इसलिए हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए। मधुर वाणी रिश्तों को जोड़ती है, जबकि कटु वाणी रिश्तों में दूरी पैदा कर सकती है। किसी के मन को चोट पहुंचाने के बाद केवल माफी मांग लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि हमें अपनी वाणी और व्यवहार को सुधारने का प्रयास भी करना चाहिए।
साध्वी जी ने कहा कि क्रोध मनुष्य की बुद्धि को प्रभावित करता है। क्रोध में लिया गया निर्णय कई बार पछतावे का कारण बन जाता है। इसलिए क्रोध आने पर मौन और धैर्य को अपनाना चाहिए। क्षमा का भाव मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है।
संयम ही मनुष्य को सही दिशा देता है
संयम के महत्व को बताते हुए साध्वी जी ने कहा कि मनुष्य की इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। यदि व्यक्ति अपनी इच्छाओं का गुलाम बन जाए तो उसके जीवन में संतोष समाप्त हो जाता है।
उन्होंने कहा कि संयम का अर्थ इच्छाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देना है। भोजन, वाणी, क्रोध, धन, समय और व्यवहार—हर क्षेत्र में संयम आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करना सीख लेता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित रह सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में आवश्यकता और लालच के बीच अंतर समझना चाहिए। जरूरत के अनुसार जीवन जीने वाला व्यक्ति संतोषी रहता है, जबकि लालच के पीछे भागने वाला व्यक्ति उपलब्धियों के बावजूद असंतुष्ट रह सकता है।
चातुर्मास आत्मचिंतन का अवसर
साध्वी जी ने कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने का समय नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन को भीतर से देखने और सुधारने का अवसर है। इन दिनों में व्यक्ति को अपने व्यवहार, विचार और आदतों का मूल्यांकन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रतिदिन कुछ समय स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि आज हमने किसका भला किया, किसे दुख पहुंचाया, कहां क्रोध किया और कहां संयम खोया। यदि कोई गलती हुई है तो उसे स्वीकार कर आगे उसे न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए।
आत्मचिंतन मनुष्य को अपनी कमियों का एहसास कराता है और सुधार का रास्ता दिखाता है। जब व्यक्ति स्वयं की कमियों को पहचानने लगता है, तभी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।
धर्म व्यवहार में दिखाई देना चाहिए
साध्वी जी ने कहा कि धर्म केवल मंदिर में पूजा करने अथवा धार्मिक ग्रंथों का श्रवण करने तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यदि हमारे भीतर दया, क्षमा, करुणा, विनम्रता और संयम का विकास नहीं हो रहा है तो हमें अपने धर्माचरण पर पुनः विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मंदिर में आकर शांति का अनुभव करना अच्छी बात है, लेकिन उस शांति को अपने घर और समाज तक लेकर जाना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। परिवार में प्रेम, बड़ों के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह और जरूरतमंदों के प्रति सहयोग का भाव रखना भी धर्म का ही हिस्सा है।
सद्कर्मों से बनता है जीवन सुंदर
प्रवचन में साध्वी जी ने कहा कि मनुष्य को बड़े कार्य करने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। रोजमर्रा के जीवन में किए गए छोटे-छोटे सद्कर्म भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। किसी जरूरतमंद की सहायता करना, भूखे को भोजन देना, दुखी व्यक्ति को सांत्वना देना, जीवों के प्रति दया रखना और किसी के प्रति कटु भाव न रखना भी जीवन को पुण्य और सद्भावना से भर देता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि उसके पास जो कुछ है, वह केवल उसके लिए नहीं है। अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की सहायता करने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का प्रयास करना चाहिए।
साध्वी जी ने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि हमने कितना पाया, बल्कि यह है कि हमने अपने जीवन से कितना अच्छा किया। धन और सुविधाएं जीवन के साथ रह सकती हैं, लेकिन मनुष्य की पहचान उसके संस्कारों और कर्मों से होती है।
प्रवचन के अंत में साध्वी रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि जीवन में कर्मों को शुद्ध रखें, अहिंसा को अपनाएं, संयम को जीवन का आधार बनाएं, क्रोध के स्थान पर क्षमा और द्वेष के स्थान पर करुणा को स्थान दें। अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाकर ही मनुष्य आत्मिक शांति और कल्याण की ओर आगे बढ़ सकता है।
चातुर्मास के 15वें दिन आयोजित इस प्रेरणादायी प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने साध्वी जी के मंगलमय एवं आध्यात्मिक विचारों का श्रवण कर जीवन में धर्म, संयम और सदाचार को अपनाने का संकल्प लिया। श्री पार्श्वनाथ जिनालय परिसर में पूरे समय श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।

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