नाग पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जगत के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी को समझने का अवसर भी है : रत्ननिधि श्री जी
अहिंसा केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है; सभी जीवों के प्रति करुणा और प्रकृति के संरक्षण का लिया संकल्प

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में निरंतर जारी है। इसी क्रम में नाग पंचमी के अवसर पर साध्वीश्री ने जीवदया, अहिंसा, आत्मचिंतन और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व को केंद्र में रखते हुए श्रद्धालुओं को प्रेरणादायी संदेश दिया। परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि नाग पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जगत के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी को समझने का अवसर भी है। भारतीय संस्कृति में नाग पंचमी के माध्यम से नाग सहित विभिन्न जीवों के प्रति सम्मान की भावना व्यक्त की जाती है। वहीं जैन दर्शन प्रत्येक जीव के अस्तित्व और उसके जीवन के अधिकार के प्रति करुणा और अहिंसा का संदेश देता है। साध्वीश्री ने कहा कि अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाना ही नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी के प्रति दुर्भावना न रखना भी है। उन्होंने कहा कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा है। धरती पर रहने वाले प्रत्येक जीव का अपना महत्व है। छोटे से छोटा जीव भी प्रकृति के संतुलन में अपनी भूमिका निभाता है। प्रवचन को आत्मचिंतन से जोड़ते हुए साध्वीश्री ने कहा कि नाग पंचमी पर हम बाहर के जीवों के प्रति करुणा की बात करते हैं, लेकिन मनुष्य को अपने भीतर छिपे क्रोध, अहंकार, लोभ, ईष्र्या और द्वेष जैसे विकारों पर भी विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। धर्म मंदिर तक सीमित नहीं, व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। अंत में साध्वीश्री ने कहा कि नाग पंचमी हमें जीवों के प्रति करुणा सिखाए, चातुर्मास हमें संयम सिखाए और आत्मचिंतन हमें अपने भीतर परिवर्तन लाने की प्रेरणा दे—इन तीनों को जीवन में उतार लिया जाए तो मनुष्य का जीवन वास्तव में धर्ममय बन सकता है।
