भगवान की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने का वास्तविक अर्थ अपने अहंकार को झुकाना है : परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में निरंतर जारी है। इसी क्रम में साध्वीश्री ने यह पत्थर नहीं, परमात्मा हैं विषय पर प्रेरणादायी प्रवचन देते हुए कहा कि जिन प्रतिमाओं को हम मंदिर में विराजमान देखते हैं, उन्हें केवल पत्थर समझकर देखना हमारी दृष्टि की कमी है। श्रद्धा और भक्ति की दृष्टि से देखें तो जिन प्रतिमा हमारे भीतर सोई हुई आत्मशक्ति को जगाने का माध्यम बनती है। प्रतिमा हमें कुछ मांगने की प्रेरणा नहीं देती, बल्कि भगवान के गुणों को अपने जीवन में उतारने का संदेश देती है। साध्वीश्री ने कहा कि जैन धर्म में तीर्थंकर भगवान को सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाले देव के रूप में नहीं, बल्कि वीतराग, सर्वज्ञ और परम आत्मस्वरूप के रूप में पूजा जाता है। भगवान की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने का वास्तविक अर्थ अपने अहंकार को झुकाना है। भगवान के शांत स्वरूप को देखकर अपने भीतर भी शांति और संयम उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रतिमा में भगवान का शरीर नहीं, बल्कि भगवान के गुणों का स्मरण महत्वपूर्ण है। जिन प्रतिमा हमें अहिंसा, सत्य, संयम, करुणा, क्षमा और वीतरागता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। मंदिर में दर्शन का उद्देश्य केवल भगवान को देखना नहीं, बल्कि भगवान के जीवन और गुणों से अपने जीवन को जोडऩा है। साध्वीश्री ने कहा कि यदि मंदिर में जाकर भी हमारा क्रोध कम नहीं होता, अहंकार नहीं मिटता, लोभ और मोह कम नहीं होते तथा किसी जीव के प्रति करुणा का भाव उत्पन्न नहीं होता, तो हमें अपनी भक्ति के स्वरूप पर आत्मचिंतन करना चाहिए। सच्ची पूजा वही है, जिसका प्रभाव मंदिर से बाहर निकलने के बाद हमारे व्यवहार में दिखाई दे। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जब भी जिनालय जाएं तो केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति की प्रार्थना न करें। कुछ क्षण शांत बैठकर स्वयं से पूछें कि मेरे भीतर कितना क्रोध है, कितना लोभ है, कितना मोह और कितना अहंकार है। भगवान के समक्ष यह संकल्प लें कि मैं अपने जीवन के किसी एक दोष को कम करने का ईमानदार प्रयास करूंगा।
