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यूपीआई एमडीआर से कम मुनाफे वाले व्यापार पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव : राजा रोहरा

0.4 प्रतिशत एमडीआर के साथ भुगतान-सेवा पर 18 प्रतिशत जीएसटी; छोटी दिखने वाली कटौती बार-बार जुड़कर बनेगी बड़ी व्यापारिक लागत


धमतरी। यूपीआई के 2,000 से अधिक के पात्र व्यापारी लेन-देन पर लागू होने वाले 0.4 प्रतिशत एमडीआर को लेकर धमतरी चेंबर ऑफ कॉमर्स के संस्थापक एवं छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स के प्रदेश उपाध्यक्ष राजा रोहरा ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इसे केवल 0.4 प्रतिशत की छोटी दर के रूप में नहीं, बल्कि दिन, महीने और वर्ष में व्यापारी के मुनाफे पर पडऩे वाले संचयी प्रभाव के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकारी व्यवस्था के अनुसार सामान्य पी2एम श्रेणी में 2,000 तक एमडीआर शून्य है। 2,000 से अधिक के पात्र भुगतान पर पूरी राशि का 0.4 प्रतिशत एमडीआर तथा 75,000 और उससे अधिक पर अधिकतम 300 प्रति लेन-देन की सीमा है। अर्थात 2,100 पर 8.40, 2,500 पर 10, 3,000 पर 12, 5,000 पर 20, 11,000 पर 44, 25,000 पर 100 और 50,000 पर 200 एमडीआर। एक भुगतान पर यह मामूली दिखता है, लेकिन असली तस्वीर तब सामने आती है जब यही कटौती दिनभर में दर्जनों बार होती है। रोहरा ने उदाहरण देते हुए बताया कि किसी सामान्य पात्र दुकान में प्रतिदिन 50 यूपीआई भुगतान हों। इनमें 20 भुगतान 2,000 या उससे कम हों तथा शेष 30 में पाँच-पाँच भुगतान 2,100, 2,500, 2,700, 2,800, 3,100 और 11,000 के हों। इन 30 भुगतानों पर प्रतिदिन लगभग 484 एमडीआर + 87.12 जीएसटी = 571.12 सकल भुगतान-सेवा लागत होगी। यही औसत बना रहे तो लगभग 17,134 प्रतिमाह और 2.06 लाख सालाना सकल भुगतान-सेवा लागत। हालांकि पात्र जीएसटी पंजीकृत व्यापारी को नियमानुसार आगत कर लाभ मिल सकता है, इसलिए जीएसटी सहित राशि को प्रत्येक व्यापारी की अंतिम शुद्ध लागत नहीं माना जाना चाहिए। यह भी स्पष्ट है कि यह सरकारी औसत नहीं, बल्कि सरकारी दर के आधार पर प्रभाव समझाने के लिए उदाहरणात्मक गणना है।
बिक्री नहीं, मुनाफे के सामने रखिए एमडीआर का हिसाब
रोहरा ने कहा, ह्लयदि ?100 की बिक्री पर किसी व्यापारी का सकल मुनाफा केवल ?2 है तो 0.4 प्रतिशत को मामूली कैसे माना जाए? उस ?2 में से अभी किराया, वेतन, बिजली, ब्याज और दूसरे खर्च भी निकलने हैं। इसलिए एमडीआर का वास्तविक प्रभाव बिक्री के प्रतिशत से नहीं, सालभर में कटे कुल एमडीआर को व्यापारी के सकल एवं शुद्ध मुनाफे के सामने रखकर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वस्तु बेचने पर लागू जीएसटी और एमडीआर सेवा पर लगने वाला जीएसटी दो अलग कर-योग्य व्यवस्थाएँ हैं; इसे एक ही बिक्री पर दो बार जीएसटी कहना सही नहीं होगा। लेकिन व्यापारी के दृष्टिकोण से वास्तविकता यह है कि माल बेचने की कर एवं परिचालन लागत पहले से है, अब पात्र डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की अलग लागत भी जुड़ रही है।
जब कुछ कम मुनाफे वाले क्षेत्रों को राहत, तो बाकी का अध्ययन क्यों नहीं?
रोहरा ने कहा कि सरकार ने रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि सामग्री जैसी निर्धारित श्रेणियों में ?2,000 से अधिक के भुगतान पर सामान्य 0.4 प्रतिशत के बजाय ?5 प्रति लेन-देन की विशेष दर रखी है। जब कम मुनाफे की वास्तविकता कुछ क्षेत्रों के लिए विशेष दर का आधार बन सकती है तो दूसरे प्रमाणित कम मुनाफे और अधिक कारोबार वाले खुदरा एवं थोक व्यापारों के लिए भी यही आर्थिक कसौटी क्यों नहीं होनी चाहिए। छोटे पात्र व्यापारियों को उपलब्ध राहत की जानकारी भी जरूरी है। पी2पीएम श्रेणी में यूपीआई क्यूआर से प्रतिमाह ?1 लाख तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारियों को शून्य एमडीआर का संरक्षण जारी रहेगा।
पहले ट्रेड लाइसेंस का दबाव, अब भुगतान की नई लागत
रोहरा ने कहा कि धमतरी के व्यापारी पहले ही ट्रेड लाइसेंस की नई शुल्क व्यवस्था को लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। अब एमडीआर एक और परिचालन लागत के रूप में सामने है। किसी एक शुल्क को अलग देखकर छोटा कहा जा सकता है, लेकिन व्यापारी कर, लाइसेंस, बैंकिंग शुल्क, ब्याज, बिजली, किराया, वेतन और अनुपालन की सभी लागतें एक ही व्यापार की कमाई से चुकाता है। सरकार को व्यापारी पर पडऩे वाले इनके संयुक्त आर्थिक प्रभाव को देखना होगा। चेंबर ने स्पष्ट किया कि वह यूपीआई का विरोध नहीं करता। यूपीआई देश की महत्वपूर्ण डिजिटल उपलब्धि है और भुगतान व्यवस्था की तकनीक, साइबर सुरक्षा तथा संचालन की लागत भी वास्तविक है। लेकिन डिजिटल भुगतान को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की कीमत ऐसी नहीं होनी चाहिए कि कम मुनाफे वाले व्यापार की अपनी आर्थिक टिकाऊ क्षमता कमजोर हो जाए। रोहरा ने केंद्र सरकार से एमडीआर व्यवस्था की पुनर्समीक्षा तथा कम मुनाफे और अधिक कारोबार वाले व्यवसायों का क्षेत्रवार अध्ययन कराने की मांग की। आवश्यकता होने पर इनके लिए कम दर, निश्चित शुल्क अथवा उचित अधिकतम सीमा निर्धारित की जाए।
उन्होंने कहा कि 2,500 के एक भुगतान पर 10 छोटा दिखाई देता है, लेकिन व्यापारी की चिंता उस एक 10 की नहीं है। यही छोटी-छोटी कटौतियाँ दिन में दर्जनों, महीने में सैकड़ों और साल में हजारों बार जुड़ती हैं। असली सवाल 0.4 प्रतिशत का नहीं—व्यापारी के सालाना मुनाफे से जाने वाली कुल राशि का है। डिजिटल भारत मजबूत हो, यूपीआई मजबूत हो—लेकिन जिस व्यापारी के सहयोग से यह व्यवस्था खड़ी हुई है, वह भी मजबूत रहना चाहिए। व्यापारी कमजोर होगा तो बाजार कमजोर होगा और बाजार कमजोर होगा तो अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ेगा।

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