जो व्यक्ति जीवन में सामंजस्य स्थापित कर लेता है उसका जीवन सुख पूर्वक बीत जाता है-परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब

धमतरी। अध्यात्म योगी उपाध्याय प्रवर परम पूज्य महेंद्र सागर जी महाराज साहेब उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब आदि ठाना परम पूज्य निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की शिष्या परम पूज्य हंसकीर्ति श्री जी महाराज साहेब आदि ठाना श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में विराजमान है। युवा मनीषी उपाध्याय प्रवर परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब ने आज के प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि जिनवाणी ऐसा है मानो जेठ माह की गर्मी हो, दोपहर का समय हो रेगिस्तान हो और उस रेगिस्तान पर एक प्यासा व्यक्ति जल की तलाश में भटक रहा हो। और इन सब के बीच उस रेगिस्तान में एक व्यक्ति प्याऊ खोल कर बैठा हो। और वह व्यक्ति सरल और सहज भाव से पानी पिलाने के लिए तत्पर हो। और वह भटकते हुए व्यक्ति को अमृत जैसा ठंडा जल पिला रहा हो। वास्तव में वह रेगिस्तान में भटकता हुआ व्यक्ति हम स्वयं है। रेगिस्तान ये बाह्य जगत अर्थात संसार है। प्याऊ खोलकर बैठा हुआ व्यक्ति गुरु महाराज है और पानी रूपी परमात्मवाणी अर्थात जिनवाणी गुरु महाराज पिलाने को तैयार है। इस जीवन में यह सब निमित्त हमें मिला है। बस आवश्यकता है उस जिनवाणी रूपी ठंडे जल को पीकर जन्मजन्मांतर के अपने आत्मा की प्यास को जिनवाणी रूपी जल के माध्यम से तृप्त करने का। हमें आंतरिक सुख को पाने का अवसर मिला है। बस जरूरत है इस अवसर का लाभ उठाने का। हम इस सुअवसर का जितना अधिक लाभ उठ पाएंगे । अपनी आत्मा को उतना ही अधिक ऊपर उठा पाएंगे। इस भव ताप के संताप से बचने के लिए सिद्धचक्र की आराधना की जाती है। हमें नवकार मंत्र के प्रथम दो पदों तक पहुंचने के लिए पहले हमे तीसरे, चौथे और पांचवे पद पर पहुंचना होगा। उसकी सहायता से हम आत्मसाधक बनकर आत्मा को मुक्ति तक पहुंचा सकते है। जिनवाणी के प्रति हमारे हृदय में जिज्ञासा होनी चाहिए। जिज्ञासा को शांत करने के लिए पहले हमे गुरु से वंचना लेनी चाहिए, फिर वाँचना पूरी होने के बाद हमे अपने मन में उठे प्रश्न को पूछकर उसका समाधान प्राप्त करना चाहिए। ताकि अन्त:हृदय में कोई संशय न रह जाए। फिर समय समय पर उसे दोहराना चाहिए ताकि उस परम ज्ञान को हम भूल न जाए। क्योंकि परमात्मा की वाणी अनंत पुण्योदय से श्रवण करने को मिलता है। भगवान गौतम स्वामी भगवान महावीर स्वामी के साथ उनके भक्त होने का आनंद लेते थे। और स्वयं परम ज्ञानवान होने के बाद भी अपने छोटे छोटे संशय का भी समाधान परमात्मा से पूछकर करते थे। परमात्मा महावीर के आगे गौतम स्वामी अपने आप को शून्य समझते थे। और गुरु के आगे स्वयं को शून्य समझने वाला शिष्य ही जीवन में आगे बढ़ता है। अधिकारों का अतिक्रमण करने वाला अंत में कष्ट ही प्राप्त करता है। जब जीवन में मान कषाय बढ़ता है तो स्वयं को सबकुछ समझने लगते है। जबकि वास्तविकता में जीवन में कभी मान कषाय आना ही नहीं चाहिए। हमें दूसरे पर अपने विचारों को थोपना नहीं चाहिए। हम दूसरों को सलाह दे सकते है लेकिन अपने सलाह को मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। जो व्यक्ति जीवन में सामंजस्य स्थापित कर लेता है उसका जीवन सुख पूर्वक बीत जाता है। और जो सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता उसका जीवन कष्टों से भर जाता है। अत: हमें विचार करना है कि हमारा जीवन सुख पूर्वक व्यतीत हो या कष्टों के साथ व्यतीत हो। उसी के अनुसार हमें कर्म करना चाहिए। हमारा जीवन सुख पूर्वक व्यतीत हो उसके लिए जीवन में आंतरिक गुणों को बढ़ाना चाहिए। हमारा आंतरिक गुण ही हमारी आत्मा को मुक्ति के मार्ग की ओर आगे बढ़ा सकता है। आत्मा के होने का अंतर्मन से अहसास होना चाहिए ताकि हम आत्मविकास के साधक बन सके। इस संसार में हम सभी जड़ वस्तुओं के पारखी बन गए या बन सकते है। लेकिन सिद्ध बुद्ध बनने के लिए आत्मा का पारखी बनना होगा। जैसे शक्कर से उसकी मिठास को नरक से उसके खारा पन को दूर नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार गुणी और गुण को कभी अलग नहीं किया जा सकता। आत्मा का गुण होता है ज्ञान, भावना, जानना, मानना, रागद्वेष, उत्साहित अनुत्साहित होना आदि। ज्ञान अन्य सभी गुणों का प्रवेश द्वार है। आत्मा से ज्ञान को कभी अलग नहीं किया जा सकता। अर्थात जहां जहां ज्ञान है वहां वहां आत्मा है ऐसा समझना चाहिए। शरीर से आत्मा के निकल जाने के बाद आत्मा की स्थिति शून्य हो जाती है। देव, गुरु और धर्म रूपी आईना मिलने के बाद भी अगर हम अपनी आत्मा को न देख पाए आत्मा का अहसास न कर पाए तो जीवन व्यर्थ है। वास्तव में शरीर नाशवान है जबकि आत्मा अजर अमर है। आत्मा का विकास ही आंतरिक विकास है। आजतक हम शरीर तो अनगिनत पा गए किंतु आज भी वही है। अर्थात आत्मा कभी नहीं बदलती। अनंतानंत भवों के बाद ये दुर्लभ मानव जीवन मिला है। इस जीवन में भी अगर हम आत्मा का अहसास न कर पाए तो ये जीवन व्यर्थ चला जायेगा। आत्मा के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आंतरिक गुणों का विकास लगातार करते जाना है।
