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एक सच्चा श्रावक हमेशा परमात्मा के बताए हुए मर्यादा अर्थात अनुशासन का पालन करता है – प्रशम सागर जी म.सा.


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज से चातुर्मास का प्रारंभ हो रहा है। हमें भी आत्म के लिए प्रयास प्रारंभ करना है। उससे पहले हमें एक सच्चा श्रावक बनने का प्रयास करना है। जीवन में सदैव, सुगुरु, सुधर्म को मानने वाला श्रावक कहलाता है। कर्म को उदय को बदलने की क्षमता किसी के पास नहीं है। इसलिए हमें सोच समझकर कर्म का बंध करना चाहिए। आज हम हंस हंस कर कर्म बांधते है और रो रो कर उस कर्म का भुगतान करना पड़ता है। जिसे यह विश्वास हो जाए कि मैं परमात्मा के जैसे बन सकता हूँ वह श्रावक है। परमात्मा की प्रतिमा देखकर विचार करना चाहिए मेरी आत्मा में भी वैसे ही गुण है जैसा परमात्मा की आत्मा में है। बस अंतर इतना है कि उन्होंने अपने पुरुषार्थ से उसे जान लिया है इस कारण संसार से मुक्त हो गए। और मैं अभी उचित पुरुषार्थ नहीं कर पाया हूँ। इसलिए संसार में भटक रहा हू। जो साधु बनने का सपना देखता है वो श्रावक है। श्रावक जीवन साधु बनने का उपाय है। साधु बनने से पहले श्रावक जीवन में आना पड़ता है। श्रावक बनकर हम जो भी तप त्याग , आराधना और साधना करते है उसका कारण भविष्य में साधु बनने की योग्यता को प्राप्त करना होता है। साधु बनने के लिए चौदह उपकरण आवश्यक होते है। जी श्रावक साधु बनना चाहता है उसे साधु के चौदह उपकरण हमेशा अपनी आंखों के सामने रखना चाहिए। साधु धर्म विषय कषाय से छुटकारा पाने का माध्यम है। श्रावक जीवन में हर पुरुषार्थ साधु जीवन पाने के लिए होता है। एक सच्चा श्रावक हमेशा परमात्मा के बताए हुए मर्यादा अर्थात अनुशासन का पालन करता है। किसी भी परिस्थिति में उस अनुशासन को नही छोड़ता। श्रावक जीवन की चरम स्थिति साधु जीवन है। अर्थात श्रावक जीवन साधु जीवन का प्रवेश द्वार है। साधु बनने के बाद ही उपाध्याय, आचार्य, अरिहंत और सिद्ध बन सकते है। आत्मा का मूल धर्म सर्वविरती धर्म अर्थात साधु धर्म है। आत्मा के लिए श्रावक जीवन केवल पड़ाव है जबकि साधु जीवन उसका लक्ष्य है। जो जीव आत्मा और शरीर का भेद समझ चुका है और आत्मा का अनुभव प्राप्त कर चुका जा वह श्रावक है। साधु के पास साधन कम होता है जबकि साधना अधिक होती है इसलिए साधु सुखी होता है। एक श्रावक को हमेशा साधु जैसा बनने की इच्छा करते हुए वंदन करना चाहिए। इस चार माह के चातुर्मास काल में हमे प्रयास करना है कि हम वास्तविक श्रावक बने दिखावटी नहीं। श्रावक के करने योग्य कर्तव्य जिनपूजा, जिनवाणी, श्रवण प्रतिक्रमण, रात्रिभोजन त्याग, जमीकंद त्याग, साथ ही सप्तव्यसन और 22 अभक्ष का पूर्णत: त्याग करना चाहिए।

Ashish Kumar Jain

Editor In Chief Sankalp Bharat News

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