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किसी के दुख को देखकर कंपित हो जाना और उसका सहयोग करना ही अनुकंपा दान है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

चातुर्मास के तहत इतवारी बाजार स्थित श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में जारी है प्रवचन


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्म योगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि सुपात्र दान क्या है ? सुपात्र दान देकर उसमें शुभ परिणाम का आना महा भाग्य है सुपात्र दान के लिए तीन चीज है सुपात्र, वस्तु, दातार । सुपात्र का अर्थ है श्रेष्ठ-दान, सुपात्र दान उन्हें करना चाहिए जो संसार से तीर चुके हैं और सबका एकांत से हित चाहते हैं, जो संसार सागर से तिरने के लिए साधना करते हैं व जिनका संसार सागर से तिरने का लक्ष्य बन चुका हो। जिन्हें आत्मा की चिंता है वे सुपात्र है, जो पाप भीरू है, चार गति से थक चुके हैं, जो संसार से निकलने का प्रयास करें वे सुपात्र है। परमात्मा ने दो प्रकार के दान बताएं है सुपात्र दान व अनुकंपा दान। अनुकंपा दान यानी किसी के दुख को देखकर कंपित हो जाना और उसका सहयोग करना। यदि सामने वाले की पीड़ा और अपने अंदर करुणा दोनों है तो यह वास्तविक अनुकंपा दान है। पूज्य यशो विजय जी महाराज ने फरमाया है कि जिन शासन में अनुकंपा दान के तीन कारण हैं। मेरे परिणाम कठोर ना बन जाए, जिन शासन की प्रभावना हो, जिन शासन की निंदा ना हो। पर जिन शासन में अनुकंपा को धर्म नहीं कहा, यदि हम शरीर के लक्ष्य से दान दे रहे हैं मतलब हमारा लक्ष्य आत्म नहीं है। सुपात्रदान भक्ति, सामने वाला गुणवान दिख रहा है (दान में सामने वाले के गुण नहीं दिख रहे हैं) और उनके जैसे बनने की इच्छा हो तो वह सच्चा दान है। परमात्मा बताते हैं कि सुपात्र दान देते समय हमारे भाव कैसे होने चाहिए- संसार असार लगना चाहिए, मुक्ति की तीव्र अभिलाषा हो, साधुचर्या से प्रेम हो व पंच महाव्रत से आकर्षण आना चाहिए। श्रावक की पहचान साधु से है। यदि सुपात्र दान सच्चा होगा जैसा परमात्मा ने फरमाया है तो हम भी चंदनबाला, संगम, नयासार, जैसे दान देते देते समयत्व की प्राप्ति कर पाएंगे और संसार से तिरने का मार्ग अपना पाएंगे।

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