संयोग की भावना आत्मा के दुख का कारण है जबकि वियोग की भावना सुख का कारण है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.
श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर परमात्मा नेमीनाथ भगवान का मनाया गया जन्मकल्याणक महोत्सव

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्म योगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज जब धर्म के 22वें तीर्थंकर परमात्मा नेमीनाथ भगवान का जन्मकल्याणक महोत्सव है। ज्ञानी कहते है जीवन की शुरुआत जन्म से नहीं होता बल्कि जब से आत्मा है तब से जन्म हो चुका है। किंतु हम जिस पल आत्मा का शरीर से संयोग होता है उसे जन्म कहते है। जिस शरीर का संयोग हुआ था उसका वियोग हो जाना ही मृत्यु है। जबकि परमात्मा जन्म और मृत्यु को केवल एक व्यवहार मानते है। अर्थात उनका मानना है कि शरीर की मृत्यु होती है आत्मा तो अजर अमर है अर्थात शाश्वत है। हमें अपने जन्मदिन का इंतजार हमेशा रहता है। किंतु जब हमारे जन्मदिन का इंतजार दूसरों को हो तो समझना मानव जीवन सफल हो गया। इसीलिए तीर्थंकर परमात्मा के जन्मदिन को जन्मकल्याणक के रूप में मनाते है क्योंकि उनका जन्म ही दूसरों के कल्याण के लिए हुआ था। परमात्मा स्वयं का कल्याण करने के साथ साथ प्राणी मात्र का कल्याण करने में सहायक होते है। परमात्मा का जन्म ही सुख प्राप्ति का अर्थात दुख से मुक्ति का मार्ग है। परमात्मा का जन्म चारगति के जीवो के उद्धार के लिए होता है। परमात्मा का जन्म स्वयं से युद्ध के लिए होता है। परमात्मा अपने जीवन में अपने मोहकर्म से युद्ध करते है। परमात्मा स्वयं से युद्ध मोह के विरुद्ध करते है। परमात्मा नेमीनाथ भगवान का जन्म आज के दिन अर्थात सावन सुदी पांचम के दिन सौरीपुर नगर में अश्वसेन राजा की भार्या शिवादेवी की रत्नकुक्षी से हुआ था। ज्ञानी कहते है आत्मा की दृष्टि से जन्म लेना पीड़ा दायक है। क्योंकि आत्मा का स्वभाव सिद्ध बुद्ध मुक्त होना अर्थात अनंतकाल के लिए शरीर से छुटकारा पाना है। एक बार जन्म लेना कई जन्म का भव भ्रमण बढ़ाना है। किंतु परमात्मा जन्म लेकर अपने अनंतकाल के भवभ्रमण को दूर करते है। इसके बाद अब कभी परमात्मा का इस संसार में जन्म नहीं होगा। अगर जन्म मरण से मुक्ति के लिए जन्म हुआ है हम ऐसा मानते है तो आने वाले समय से भवभ्रमण को कम कर सकते है। मुक्ति का भाव रखने वाला मानव जीवन पाकर मुक्ति पा लेता है किंतु मनुष्य भव चाहने वाला मुक्ति पा ले आवश्यक नहीं है हो सकता उसके कर्मों के कारण उसका भव भ्रमण बढ़ जाए। ज्ञानियों का कहना है संयोग की भावना आत्मा के दुख का कारण है जबकि वियोग की भावना सुख का कारण है। आत्मा का शरीर से संयोग होने पर कर्मों का आगमन होता है और ये भवभ्रमण बढ़ता है अर्थात ये आत्मा के लिए दुख का कारण बन जाता है।
