जिनवाणी में हमारे जीवन की सभी समस्याओं का समाधान है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म. सा.

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आत्मा का स्वभाव है निज में विश्वास करना अर्थात स्वयं के ही शरण में रहना। यही आत्मा का अनुशासन है। तत्वों को समझकर भव भव के अज्ञान को दूर करना है। आत्मा ही आत्मा की वास्तविक शरण है। शरीर तो केवल एक पड़ाव है। जो अपने आत्मा को भूल जाता है वो चारों गति में भटकता रहता है और वो कहीं भी सुख नहीं पाता। लेकिन जो अपनी आत्मा को देख लेता है अर्थात आत्मा की वास्तविकता को जान लेता है वो संसार के भ्रमण से दूर हो जाता है। परमात्मा हमे हमारा वास्तविक स्वरूप बताते हुए साधु जीवन में जीना सीखते हैं। साथ ही माता की तरह जिनवाणी रूपी लोरी सुनकर आत्मा को चैन की नींद अर्थात शाश्वत सुख दिलाने का प्रयास करते हैं। आत्मा शाश्वत है ये अजर अमर है आत्मा ही शुद्ध स्वरूप है। अब इसे विषय कषाय के मैल से अशुद्ध नहीं करना है । तभी इस मानव जीवन की सार्थकता है। संसार में हम जब तक है तब तक कोई न कोई शत्रु भी है। किंतु अब ऐसा प्रयास करना है जब हम संसार से जाए तो कोई शत्रु न हो। जिनवाणी ही ऐसा माध्यम है। जिसके माध्यम से शत्रु को भी मित्र बना सकते है। जो काम शस्त्र नहीं कर सकता वो काम शास्त्र कर सकता है जिनवाणी में हमारे जीवन की सभी समस्याओं का समाधान है। केवल जरूरत है उसके प्रति श्रद्धा रखने की। हमारे जीवन में अपने धर्म ग्रन्थ के प्रति बहुमान, अहोभाव होना चाहिए। उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से परमात्मा फरमाते है कि हरपल जाते हुए जीवन से अपनी आत्मा के लिए कुछ अच्छा काम करो। मानव जीवन हमारे पुण्य का ऋणी है। जीवन से प्रमाद को दूर करके आत्मा के मार्ग को प्रशस्त करना है। हमारा मन ही आत्मा को परमात्मा बना सकता है।

