रक्षाबंधन का पर्व हमे हमारी संस्कृति की खुशबु और परिचय देती है-परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पार्श्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि मेरा मन संसार के बंधन में बंधना चाहता है लेकिन आत्मा इससे छुटकारा चाहती है। इसी कशमकश में जीवन निकल रहा है। ये संसार का बंधन मीठा और मधुर है। लेकिन बंधन तो बंधन ही होता है। ये बंधन ही 84 लाख योनियों में ले जाता है। इसी बंधन का आलंबन हमे संसार में घुमाते रहता है। मुझे इस संसार के कसकमस का दहशत है कि मेरा जीवन ऐसे ही न बीत जाए। इस संसार से बेचैन मेरी आत्मा कहती है मुझे राग द्वेष से मुक्त होने दो, तभी चैन मिल सकता है। संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहां मुझे चैन और शांति मिल सके। इसलिए अब इस संसार को छोड़कर आत्मा के चैन और शांति के लिए मुक्त होना है। इस भव सागर के मंथन में अमृत और गरल दोनों है। मुझे क्या लेना है ये मेरे विवेक पर, मेरे समझ पर निर्भर है। अगर अनंत सुख चाहिए तो निश्चित ही मुक्ति रूपी अमृत लेना पड़ेगा। और दुख चाहिए तो संसार रूपी गरल लेना चाहिए। इस चातुर्मास काल में हमे अपने सुंदर भविष्य के निर्माण के लिए करना है। भारत देश पर्वों का देश है। पूरी दुनिया में भारत एक ऐसा देश है जहां साल के दिन कम है और पर्व ज्यादा है।पर्व के दिन हमें जगाने आता है। आज रक्षाबंधन का पर्व है। पर्व हमे हमारी संस्कृति का परिचय देते है। इससे हमारे संस्कृति की खुशबू आती है। पर्व से भारत की आर्य संस्कृति को जन सकते है। पर्व के माध्यम से पारिवारिक,सामाजिक, व्यापारिक जीवन की रूपरेखा तय कर सकते है। इस पर्व के साथ ही आज चातुर्मास काल का एक माह भी पूरा हो गया। रक्षाबंधन भाई बहन के पावन पवित्र प्रेम का पर्व है। भारतीय संस्कृति या आर्य संस्कृति में ही ऐसा निस्वार्थ पवित्र प्रेम हो सकता है। इस पर्व में एक दूसरे के प्रति अपनत्व की भावना होती है। ये पर्व भाई बहन के रिश्ते को और अधिक मजबूत करने का पर्व है। इस पर्व के संबंध में महापुरुषों का कहना है। इसमें दो शब्द है रक्षा और बंधन । दोनों का अर्थ भी विपरीत है। रक्षा हमे पसंद है और बंधन न पसंद।
लोकोत्तर रूप में इसका अर्थ है आप इस संसार के बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करो और उनके शरण में आ जाओ जो हमारी अर्थात हमारे आत्मा की सुरक्षा कर सके। और वो है देव,गुरु और धर्म।संसार के सभी जीवों के साथ अनंतकाल से हमने कोई न कोई रिश्ता बनाया है। फिर भी आजतक असुरक्षा का भय बना रहा। अब उनसे रिश्ता जोड़ने का प्रयास करना है जिसके बाद सुरक्षा के प्रति कोई भय न रहे। संसार के बंधनों से मुक्त होने के लिए हमें उनकी शरण लेना चाहिए जो संसार के बंधन से मुक्त हो चुके है। साथ हो हमे अपनी आत्मा के बंधन में आना है। तभी आत्मा का विकास हो सकता है और हमें मुक्ति दिला सकता है। जिस प्रकार नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए पुल की जरूरत होती है। उसी प्रकार जीवन में संसार एक छोर है और मुक्ति दूसरा छोर है। अर्थात इस संसार से मुक्ति तक पहुंचने के लिए देव ,गुरु , धर्म रूपी पुल पर चलना होगा। अर्थात इन तीनों का साथ ही हमे संसार से मुक्ति तक पहुंचा सकता है।परमात्मा के ज्ञान से अगर हम स्वयं को बांध ले तो तीनों काल और चारों गति से हम हमेशा सुरक्षित रहेंगे.रक्षाबंधन का पर्व उन सभी के लिए है जो किसी न किसी बंधन में है। ज्ञानी कहते है जिनके जीवन में दुख, क्लेश, पीड़ा चल रहा है वो सभी बंधन में है। पुण्य के उदय में बंधन होता है लेकिन उसे हम समझ या देख नहीं पाते। जबकि पाप के उदय में बंधन को समझना और देखना सरल होता है। संसार के बंधनों से मुक्त होने के लिए हमें रक्षाबंधन मनाना है।जिस वस्तु के बिना हम नहीं रह पाते वो सब बंधन है। ज्ञानियों का कहना है कि बंधन से मुक्त होने के लिए पहले उसे पहचानना होगा।

