सावन और हरेली हमें देते हैं जीवदया, अहिंसा और प्रकृति संरक्षण का संदेश : रत्ननिधि श्री जी म.सा.
श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में चातुर्मासिक प्रवचन जारी, प्रकृति के साथ मन को भी हराभरा रखने का किया आह्वान

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में निरंतर जारी है। इसी क्रम में साध्वीश्री ने सावन और हरेली तिहार के महत्व को जैन धर्म के अहिंसा, जीवदया, संयम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के संदेश से जोड़ते हुए श्रद्धालुओं को प्रेरणादायी संदेश दिया। परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कहा कि सावन केवल बारिश और हरियाली का मौसम नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराने वाला समय भी है। वर्षा के आगमन के साथ धरती हरियाली से आच्छादित हो जाती है, खेतों में नई उम्मीद जन्म लेती है और किसान के जीवन में उत्साह आता है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति में हरेली तिहार प्रकृति, कृषि और किसान जीवन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को अभिव्यक्त करता है। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और अहिंसा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। संसार में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि अनेक प्रकार के सूक्ष्म और स्थूल जीवों का अस्तित्व है। इसलिए मनुष्य को अपने व्यवहार में ऐसी सावधानी रखनी चाहिए जिससे किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट न पहुंचे।
चातुर्मास और वर्षाकाल का गहरा संबंध
साध्वीश्री ने कहा कि वर्षाकाल में सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है। इसी कारण जैन साधु-साध्वियों के लिए चातुर्मास का विशेष महत्व है। चातुर्मास आत्मचिंतन, स्वाध्याय, संयम और साधना का अवसर है। इस अवधि में बाहर की यात्राओं को सीमित कर साधना और धर्मचिंतन को अधिक महत्व दिया जाता है।
हरेली केवल पर्व नहीं, प्रकृति के प्रति आभार
प्रवचन में हरेली तिहार की लोकपरंपरा का उल्लेख करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि यह पर्व कृषि और किसान के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। किसान जिन कृषि उपकरणों और पशुधन के सहयोग से खेती करता है, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना हमारी संस्कृति की सुंदर परंपरा है। साध्वीश्री ने कहा कि हरेली के अवसर पर चारों ओर हरियाली दिखाई देती है, लेकिन हमें अपने मन के भीतर भी हरियाली लाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में अन्न का विशेष महत्व है। चातुर्मास में आत्मचिंतन का संकल्प लें। उन्होंने श्रद्धालुओं से क्रोध कम करने, अहंकार छोडऩे, लोभ पर नियंत्रण रखने, जीवों के प्रति करुणा रखने, प्रकृति का सम्मान करने और अहिंसा व संयम के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।


