धर्म केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं हो बल्कि हमारे विचारों, वाणी और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए – परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी
धर्मसभा में गूंजा संदेश—दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलें

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के पावन सानिध्य में प्रतिदिन धर्मसभा एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ संपन्न हो रहे हैं। धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर दूसरों की कमियां देखने और उन्हें बदलने की कोशिश में अपना समय व्यतीत कर देता है, जबकि वास्तविक धर्म की शुरुआत स्वयं के भीतर झांकने से होती है। दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलना जरूरी है। यदि व्यक्ति अपने क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और द्वेष पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करे, तो उसके जीवन में शांति और सकारात्मकता का संचार हो सकता है। उन्होंने कहा कि धर्म केवल मंदिर आने, पूजा-पाठ करने या धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है। धर्म हमारे विचारों, वाणी और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। हमारी वाणी से किसी का मन न दुखे, हमारे व्यवहार से किसी को पीड़ा न पहुंचे और हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष न रहे—यही धर्म की वास्तविक साधना है। साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन आत्मचिंतन करना चाहिए। दिनभर में हमने क्या किया, किससे कैसा व्यवहार किया, हमारी वाणी से किसी को ठेस तो नहीं पहुंची और हमारे मन में किसी के प्रति गलत भावना तो उत्पन्न नहीं हुई—इन सभी बातों पर विचार करना ही आत्मनिरीक्षण है। जब व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी उसके व्यक्तित्व और जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है। प्रवचन में क्रोध और अहंकार से बचने की प्रेरणा दी गई। धर्म का प्रभाव हमारे आचरण में दिखाई देना चाहिए। साध्वीश्री ने श्रावक-श्राविकाओं से आह्वान किया कि वे चातुर्मास को आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का अवसर बनाएं।