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मन को स्थिर करना ही सुखी जीवन की कुंजी – रत्ननिधि श्री जी म.सा.

समझाया चंचल मन को शांत करने का मार्ग, ध्यान-स्वाध्याय और सकारात्मक चिंतन अपनाने का दिया संदेश


धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी म.सा.की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी म.सा. की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा-4 के सानिध्य में प्रतिदिन धर्मसभा एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हो रहे हैं। धर्मसभा में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने मन को स्थिर करना ही सुखी जीवन की कुंजी विषय पर भावपूर्ण एवं आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी समस्या बाहर की परिस्थितियां नहीं, बल्कि मन की चंचलता है। मन एक क्षण में अतीत की यादों में चला जाता है और अगले ही क्षण भविष्य की चिंता करने लगता है। इसी कारण मनुष्य वर्तमान में रहते हुए भी शांति का अनुभव नहीं कर पाता। उन्होंने कहा कि मन शांत है तो साधारण जीवन भी सुखमय लगता है और मन अशांत है तो सारी सुविधाएं होने के बाद भी जीवन में बेचैनी बनी रहती है। इसलिए वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मन की स्थिरता में है। मन को जीतना ही सबसे बड़ी साधना है। जिस व्यक्ति ने अपने मन को जीत लिया, उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी विजय प्राप्त कर ली। चिंता नहीं, चिंतन जरूरी है। चिंता मन की शांति छीन लेती है। साध्वी श्री ने कहा कि क्रोध मनुष्य के विवेक को कमजोर कर देता है। उन्होंने कहा कि तुलना छोडि़ए, संतोष अपनाइए। ध्यान और स्वाध्याय से मन को दिशा मिलेगी। प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि जीवन को बदलने के लिए हमेशा बड़ी परिस्थितियों के बदलने का इंतजार नहीं करना चाहिए। परिवर्तन की शुरुआत मन से होती है। विचार बदलेंगे तो व्यवहार बदलेगा, व्यवहार बदलेगा तो कर्म बदलेंगे और कर्म बदलेंगे तो जीवन की दिशा बदल जाएगी।

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