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मोह में फंसकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को भूल जाना ही संसार के बंधन को बढ़ाता है : रत्ननिधि श्री जी म.सा.


धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी म.सा. की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी म.सा. की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में निरंतर जारी है।
इसी क्रम में प्रवचन के दौरान परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि मनुष्य के जीवन में आने वाले सुख-दु:ख केवल बाहरी परिस्थितियों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि हमारे कर्मों का भी गहरा प्रभाव होता है। जब जीव राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों में उलझता है, तब कर्मों का बंधन और अधिक मजबूत होता जाता है। उन्होंने कहा कि मोह ही वह शक्ति है, जो जीव को संसार की वस्तुओं और संबंधों में अत्यधिक आसक्त कर देती है। मनुष्य धन, संपत्ति, परिवार, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों को स्थायी मानकर उनसे जुड़ जाता है, जबकि संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है। आज जो हमारा है, कल किसी और का हो सकता है। इसलिए मोह में फंसकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को भूल जाना ही संसार के बंधन को बढ़ाता है। म.सा.ने समझाया कि माया केवल धन-दौलत या भौतिक वस्तुओं का नाम नहीं है, बल्कि मन का वह भ्रम भी माया है, जिसमें व्यक्ति अस्थायी को स्थायी और शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठता है। इसी भ्रम के कारण मनुष्य बार-बार कर्मों का संचय करता है और जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है। उन्होंने कहा कि कर्मों से मुक्ति पाने के लिए सबसे पहले अपने भीतर झांकना आवश्यक है। दूसरों की कमियां देखने के बजाय यदि मनुष्य अपने क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह को पहचानने लगे तो आत्मशुद्धि की यात्रा प्रारंभ हो सकती है। बाहर की परिस्थितियों को बदलने से पहले भीतर के भावों को बदलना जरूरी है। उन्होंने धर्मसभा को प्रेरणा देते हुए कहा कि मोह को कम करने का मार्ग त्याग, संयम, क्षमा, स्वाध्याय और प्रभु की आराधना से होकर गुजरता है। जब मनुष्य सुख-दु:ख में समभाव रखना सीखता है और वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम करता है, तब कर्मों का बंधन धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।

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