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भगवान के प्रति भक्ति तभी सार्थक होती है, जब हमारे व्यवहार में दया, क्षमा, संयम और अहिंसा दिखाई दे – परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

कहा श्रीकृष्ण जन्म की लीला में छिपा है धर्म, प्रेम और सत्य का संदेश


धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी म.सा. की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी म.सा. की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में निरंतर जारी है। इसी क्रम में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर साध्वीश्री ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म एवं उनकी विभिन्न लीलाओं का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, सत्य, प्रेम, करुणा और आत्मचिंतन का संदेश दिया।
साध्वीश्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का प्रतीक माना जाता है। जब-जब जीवन में अंधकार बढ़ता है, तब सत्य और धर्म का प्रकाश मार्गदर्शन करता है। श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोडऩा चाहिए। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। चारों ओर विपरीत परिस्थितियां थीं, लेकिन उसी अंधकार में आशा का प्रकाश प्रकट हुआ। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जब मनुष्य अपने भीतर के मोह, क्रोध, अहंकार और अज्ञान के बंधनों में कैद होता है, तब आत्मज्ञान का प्रकाश ही उसे मुक्ति की दिशा दिखाता है। इसलिए कृष्ण जन्मोत्सव हमें बाहरी उत्सव के साथ-साथ अपने भीतर भी धर्म और सद्भाव का जन्म कराने की प्रेरणा देता है। साध्वीश्री ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी लीलाओं में प्रेम, सरलता, आनंद और करुणा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। माखन चोरी की लीला को केवल मनोरंजन के रूप में देखने के बजाय उसके भाव को समझना चाहिए। माखन मन की निर्मलता का प्रतीक माना जा सकता है। जैसे मंथन के बाद दूध से मक्खन निकलता है, वैसे ही आत्मचिंतन और साधना के मंथन से मनुष्य के भीतर से निर्मलता और सद्गुण प्रकट होते हैं। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा आनंद बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि निर्मल मन और प्रेमपूर्ण व्यवहार में है। भगवान के प्रति भक्ति तभी सार्थक होती है, जब हमारे व्यवहार में दया, क्षमा, संयम और अहिंसा दिखाई दे। साध्वीश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि जन्माष्टमी पर केवल झांकी सजाने और उत्सव मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने जीवन में भी एक सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प लें। अपने भीतर के क्रोध को शांत करें, अहंकार को त्यागें, किसी के प्रति द्वेष न रखें और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा का भाव रखें। यही किसी भी धार्मिक पर्व की वास्तविक सार्थकता है।

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